धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

रोड शो- 14 : बातें परोपकार की

आज बातें परोपकार की करते हैं.

परोपकार की बातें करने से पहले हम आपको पल-पल परोपकार करने वाले प्रभु के परोपकार की एक अद्भुत खबर के बारे में बताते हैं, आप इस खबर को पढ़कर आनंद लीजिएगा-

”आसमान से घर में गिरा अनमोल ‘खजाना’, एक झटके में करोड़पति हुआ खुशनसीब

उल्‍कापिंड के गिरने से घर की छत में बड़ा सा छेद
उल्‍कापिंड के गिरने के समय जोसुआ उत्‍तरी सुमात्रा के कोलांग में अपने घर के बगल में काम कर रहे थे। इस आकाश से गिरे पत्‍थर का वजन करीब 2.1 किलोग्राम है। उल्‍कापिंड के गिरने से उनके घर की छत में बड़ा सा छेद हो गया। यही नहीं उल्‍कापिंड गिरने पर 15 सेंटीमीटर जमीन में धंस भी गया। आकाश से गिरा यह पत्‍थर जोसुआ के आर्थिक संकट को दूर कर गया। इस उल्‍कापिंड के बदले जोसुआ को 14 लाख पाउंड या करीब 10 करोड़ रुपये मिले हैं। जोसुआ ने जमीन के अंदर गड्ढा खोदकर अनमोल उल्‍कापिंड को बाहर निकाला।”

परोपकार पर सुभाषित-

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थ मिदं शरीरम् ॥

भावार्थ :
परोपकार के लिए वृक्ष फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए ही बहती हैं और गाय परोपकार के लिए दूध देती हैं अर्थात् यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है ।

रविश्चन्द्रो घना वृक्षा नदी गावश्च सज्जनाः ।
एते परोपकाराय युगे दैवेन निर्मिता ॥

भावार्थ :
सूर्य, चन्द्र, बादल, नदी, गाय और सज्जन – ये हरेक युग में ब्रह्मा ने परोपकार के लिए निर्माण किये हैं ।

परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

भावार्थ :
परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है । वे पशु धन्य है, मरने के बाद जिनका चमड़ा भी उपयोग में आता है ।

परोपकारी के जीवन का उद्देश्य होता है-
अच्छे काम करते रहिए,
चाहे लोग तारीफ़ करें या न करें,
आधी से ज्यादा दुनिया सोती रहती है,
‘सूरज’ फिर भी उगता है.
और रोशनी बांटता है,

हमारे जितने भी मनीषी हुए हैं उन्होंने न सिर्फ परोपकार की महिमा गाई-सुनाई है, परोपकार की मिसाल भी प्रस्तुत की है. आज भी ऐसी अनेक मिसालें हमारे सम्मुख प्रस्तुत हैं-

सोनू सूद-
जिस प्रकार सत्य बोलने के लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती, सत्य मन से निकलता है, उसी प्रकार परोपकार करने लिए कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती, परोपकार मन से निकलता है. कोरोना काल की त्रासदी शुरू होते ही सोनू सूद परोपकार का प्रतीक बन गए. कहा जा सकता है, कि उनके पास धन का आधिक्य था, धन का आधिक्य तो बहुतों के पास था, पर सोनू सूद के मन से परोपकार की भावना प्रस्फुटित हुई और वे निःस्वार्थ भाव से परोपकार करते चले गए. इतिहास में सोनू सूद के नाम का एक नया पन्ना जुड़ गया. खबर आई है-

”सोनू सूद बने पंजाब के स्टेट आइकन, एक्टर ने कहा- इमोशनली मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है”

बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद को चुनाव आयोग ने पंजाब का स्टेट आइकन नियुक्त किया है। इसपर सोनू सूद ने कहा कि यह पल उनके लिए बहुत मायने रखता है, इमोशनली। बता दें कि सोनू सूद का जन्म पंजाब में हुआ था। वह पंजाब में चुनाव संबंधी जागरूकता फैलाते नजर आएंगे। इस सिलसिले में चुनाव आयोग ने सोमवार को एक पत्र जारी किया था।

सोनू सूद कहते हैं कि मैं इस सम्मान के लिए खुद को खुशकिस्मत मानता हूं। सभी का शुक्रिया। पंजाब में जन्म लेना, मेरे लिए इमोशनली यह बहुत मायने रखता है। मुझे खुशी है कि मेरा राज्य मुझपर गर्व महसूस करता है। आगे अच्छा कार्य करने के लिए मैं प्रेरित हुआ हूं।

रविंदर सूदन-
आज के कोरोना काल में घर में कैद रहने की बोरियत को हटाने के लिए परोपकार की साकार प्रतिमा हमारे ब्लॉगर भाई रविंदर सूदन भी अपनी ओर से भरसक प्रयास कर रहे हैं. वे गरीब और अनाथ बच्चों को क्रॉफ्ट सिखा रहे हैं, अभी हाल ही में उन्होंने बच्चों को मोर बनाना सिखाकर अपार खुशी प्रदान की. उन्हीं की जुबानी प्रस्तुत है अपने-अपने मोर———-
”रिंग और मोर के लिए गत्ता काटा, उसपर रंगीन कागज़ चिपकाया। पंख के लिए पहले सफ़ेद कागज़ से पंख का डंठल बनाया, फिर अलग अलग रंग के अलग अलग साइज के कागज़ काट कर पंख बनाया फिर पंखों को फेविकोल से पीछे से चिपका दिया। बच्चों ने अपने-अपने मोर बनाकर खूब आनंद उठाया ।
रविंदर भाई बच्चों को और भी बहुत कुछ सिखा रहे हैं, जो वे आपको कामेंट्स में बताएंगे.

परोपकार की झलक उनकी एक प्रतिक्रिया में भी दिखती है-
”गर्व और घमंड में बहुत ही छुपा हुआ अंतर है. मेरे गुरु रामचंद्र जी महाराज कहते थे, अपने काम पर गर्व करने में कोई बुराई नहीं, ईश्वर का धन्यवाद करें कि इस लायक बनाया कि मैं यह कर सका. पर यह सोचना कि सिर्फ मैं ही इसे कर सका, और कोई इसे नहीं कर सकता घमंड है.”

सुदर्शन खन्ना-
परोपकार की भावना सुदर्शन खन्ना के अंतर्मन में भी प्रबल है. परोपकार के लिए ही वे अनेक नई-नई जानकारियों का आबंटन अपने आलेखों और प्रतिक्रियाओं में करते हैं. कल के ब्लॉग ‘तस्वीर (लघुकथा)’ में सुदर्शन खन्ना ने परोपकार की प्रतिमूर्ति स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज के बारे में विस्तृत जानकारी दी थी-
”भारत में संन्यास की एक विशेष परम्परा है। हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर संन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है; पर कई लोग पूर्व जन्म के संस्कार या वर्तमान जन्म में अध्यात्म और समाज सेवा के प्रति प्रेम होने के कारण ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो जाते हैं।आद्य शंकराचार्य ने समाज में हो रहे विघटन एवं देश-धर्म पर हो रहे आक्रमण से रक्षा हेतु दशनामी संन्यासियों की परम्परा प्रारम्भ की; पर इन दशनाम संन्यासियों से अलग भी अनेक प्रकार के पन्थ और सम्प्रदाय हैं, जिनमें रहकर लोग संन्यास व्रत धारण करते हैं।🚩ऐसे लोग प्रायः भगवा वस्त्र पहनते हैं, जो त्याग और बलिदान का प्रतीक है। ऐसे ही एक संन्यासी थे स्वामी प्रेमानन्द जी, जिन्होंने संन्यास लेने के बाद समाज सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया। वे पूजा पाठ एवं साधना तो करते थे; पर उनकी मुख्य पहचान परोपकार के कामों से हुई।स्वामी जी का जन्म १८ नवम्बर, १९३० को पंजाब के एक धनी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। सम्पन्नता के कारण सुख-वैभव चारों ओर बिखरा था; पर प्रेमानन्द जी का मन इन भौतिक सुविधाओं की बजाय ध्यान, धारणा और निर्धन-निर्बल की सेवा में अधिक लगता था। इसी से इनके भावी जीवन की कल्पना अनेक लोग करने लगे थे।🌅 श्री प्रेमानन्द जी का बचपन कश्मीर की सुरम्य घाटियों में बीता। वहाँ रहकर उनका मन ईश्वर के प्रति अनुराग से भर गया। वे अपने जीवन लक्ष्य के बारे में विचार करने लगे; पर उन्होंने शिक्षा की उपेक्षा नहीं की। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में और पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए किया।इसके बाद वे अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे; पर उनके लिए तो परमपिता परमात्मा ने कोई और काम निर्धारित कर रखा था। धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक माया मोह से हट गया। वे समझ गये कि भौतिक वस्तुओं में सच्चा सुख नहीं है। वह तो ईश्वर की प्राप्ति और मानव की सेवा में है।🏦उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और अपने आध्यात्मिक गुरू से संन्यास की दीक्षा ले ली। लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते थे; पर अब उनके जीवन का मार्ग दूसरा ही हो गया था। स्वामी जी ने मानव कल्याण के लिए अनेक ग्रन्थों की रचना की।उन्होंने हिन्दी में मानव जाग, जीव शृंगार; अंग्रेजी में आर्ट ऑफ़ लिविंग, लाइफ ए टैण्डर स्माइल तथा उर्दू में ऐ इन्सान जाग नामक पुस्तकें लिखीं। ये पुस्तकें आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं; क्योंकि इनसे पाठकों को अपना जीवन सन्तुलित करने का पाथेय मिलता है।📚इन पुस्तकों में उनके प्रवचन भी संकलित हैं, जो सरल भाषा में होने के कारण आसानी से समझ में आते हैं। उनके लेखन और प्रवचन का मुख्य विषय विज्ञान और धर्म, विश्व शान्ति, विश्व प्रेम, नैतिक और मानवीय मूल्य, वेदान्त और जीवन की कला आदि रहते थे।उन्होंने साधना के बल पर स्वयं पर इतना नियन्त्रण कर लिया था कि वे कुल मिलाकर ढाई घण्टे ही सोते थे। शेष समय वे सामाजिक कामों में लीन रहते थे। २३ अप्रैल, १९९६ को मुकेरियाँ (पंजाब) के पास हुई एक दुर्घटना में स्वामी जी का देहान्त हो गया। आज भी उनके नाम पर पंजाब में अनेक विद्यालय और धर्मार्थ चिकित्सालय चल रहे है।”

सुदर्शन खन्ना अनेक समाजसेवी संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. अभी हाल ही में उनका एक पोस्टर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था-
”प्रिय साथियों नमस्कार   आप सब को सूचित किया जाता है किसी को भी प्लाज्मा की आवश्यकता है कृपया हमारी एनजीओ को संपर्क करें 9212678268/9625510379
[7/3, 3:02 PM] Pawan Dalmia: Sharing a Consolidated List of #Plasma Resources for those in need in India especially Delhi-NCR , hope it helps someone…”

सुदर्शन भाई ने परोपकार का एक किस्सा भी प्रतिक्रिया में लिखा है-
40 वर्षों से ढाबा चला रहे हैं ये बुजुर्ग दादा, फ्री में भी लोगों को खिला देते हैं खाना
कहते हैं ना कि इंसान के नेककाम ही दुनिया याद रखती है और उसी से उसका नाम होता है। क्योंकि दुनिया को ये फर्क नहीं पड़ता कि किसके पास कितना धन है। दुनिया को इस बात से फर्क पड़ता है कि कौन लोगों की मदद कर रहा है। कौन दुनिया को बेहतर बनाने की ओर बढ़ रहा है। गुजरात के मोरबी शहर के रहने वाले बचुदादा एक ढाबे चलाते हैं। इस ढाबे का नाम ही ‘बचुदादा का ढाबा’ है। बीते 40 वर्षों से वो लोगों को खाना खिला रहे हैं। उनके ढाबे की एक खास बात ये है कि वहां जो भी आए वो भूखा नहीं जाता। यानी अगर किसी के पास पैसे नहीं है तो खाना फ्री में ही खिलाते हैं वो।झोपड़ी में रहते हैं और ढाबा चलाते हैं72 वर्षीय बचुदादा बीते 40 वर्षों से ही मोरबी शहर में रह रहे हैं। वो झोपड़ी में रहते हैं और ढाबा चलाते हैं। उनके यहां खाने की पूरी थाली का रेट तो 40 रुपये है। पर जैसे किसी के पास 10-20 रुपये भी होते हैं, तो बचुदादा उसे भी भरपेट खाना देते हैं। जैसे किसी के पास पैसे नहीं होते तो वो उसे भी खाना खिलाते हैं। उनके ढाबे से कोई शख्स भूखा वापस नहीं जा सकता।बता दें कि 10 महीने पहले बचुदादा की पत्नी का निधन हो गया। तब से वो अकेले ही ढाबा चला रहे हैं। पहले उनकी पत्नी भी उनका साथ देती थीं। उनकी थाली में तीन स्वादिष्ट सब्जियां, रोटी-दाल-चावल, पापड़ और छाछ भी होता है। जानकारी के लिए बता दें कि ढाबे के आसपास गरीब लोग रहते हैं। उनके पास पैसे कम होते हैं। तो वो कम पैसे में बचुदादा के यहां चले जाते हैं और भरपेट खाना खाते हैं। बचुदादा का मानना है कि उनके यहां से कोई भूखा नहीं जाना चाहिए। सलाम है बचुदादा को।

सुदर्शन भाई का यह आगाह भी परोपकार के लिए है-
अक्‍सर कहा जाता है कि संडे हो या मंडे, रोज खाएं अंडे लेकिन अगर आप ऐसा करते हैं तो सावधान हो जाएं। ऑस्‍ट्रेलियाई शोध में खुलासा हुआ है कि रोज एक अंडा खाने से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 60 फीसदी तक बढ़ जाता है। ऑस्‍ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने 8,545 चीनी युवाओं पर किए शोध में पाया कि ज्‍यादा मात्रा में अंडे खाने और शरीर में हाई ब्‍लड शूगर लेवल के बीच में सकारात्‍मक संबंध है।दुनियाभर में अंडे को बेहद उपयोगी और पोषक तत्‍व से भरपूर माना जाता है। यही नहीं उसे एक ‘हेल्‍दी फास्‍ट फूड’ के रूप में बढ़ावा दिया जाता है। यही अंडा अब मधुमेह पर शोध करने वालों के लिए पहेली बन गया है। इससे पहले आए शोध में कहा गया था कि रोज अंडा खाने से डायबिटीज नहीं होता है लेकिन अब ताजा शोध में यह दावा पलट गया है।

परोपकार की अद्भुत मिसाल है ये अद्भुत प्रेरक सुर्खियां-

बेटी और पत्नी की याद में 10 वर्षों से फ्री में खिला रहे हैं गरीबों को खाना

कर्नाटक: ‘प्लास्टिक कचरे’ को रीसाइकल कर बना दिया खूबसूरत घर

डूब रही थी चीनी लड़की, ब्रिटिश राजनयिक ने छलांग लगाई, बचाई जान

बाढ़ में डूबने वाला था डॉगी, शख्स ने ऐसे की मदद

जिनको हुआ है कोरोना उनके परिवारों को खाना खिलाती है इन 10 महिलाओं की टीम

जिस बच्चे ने जवानों को किया था सैल्यूट, उसने पहनी ‘यूनिफॉर्म’ और फिर ठोका सैल्यूट
फिलहाल इस बच्चे का एक और वीडियो सामने आया है। जिसमें ये बच्चा सेना की वर्दी में दिख रहा है और वो फिर से सैल्यूट ठोकता है।

चलते चलते आपको एक अनोखी प्रेरक खबर सुनाते चलते हैं-
संस्कृत भाषा वाला गांव———
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील से महज 6 किलोमीटर दूर स्थित मोहद गांव। यहां आम बोलचाल की भाषा संस्कृत है। देश का सातवां और मध्य प्रदेश का दूसरा गांव, जहां की बोलचाल की भाषा है संस्कृत। खास बात यह कि यहां भाषा के रास्ते में कभी धर्म या जाति आड़े नहीं आई। पंडे, पुरोहितों की पोथियों में अब तक सिमटी रही संस्कृत को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य से लेकर अनुसूचित जाति, जनजाति, मुसलमान तक सभी ने सम्मान दिया और अपनाया।

बातें परोपकार की और भी बहुत-सी हैं, आज बस इतना ही. शेष बातें फिर कभी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “रोड शो- 14 : बातें परोपकार की

  1. Delhi News: लापता बच्चों को तलाशने पर दिल्ली पुलिस की इस महिला हेड कॉन्स्टेबल को मिला आउट ऑफ टर्न प्रमोशन
    दिल्ली पुलिस में पहली बार लापता बच्चों को तलाशने के लिए किसी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया गया है। पुलिस कमिश्नर एस.एन. श्रीवास्तव ने गुमशुदा बच्चों को तलाशने के काम में तेजी लाने के लिए पुलिसवालों को प्रोत्साहित करने के मकसद से इसी साल अगस्त में एक नई इंसेंटिव स्कीम का ऐलान किया था। उसी के तहत अब पहली बार आउटर-नॉर्थ जिले के समयपुर बादली थाने में तैनात दिल्ली पुलिस की महिला हेड कॉन्स्टेबल सीमा ढाका को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया गया है। कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद वह असिस्टेंट सब-इंस्पैक्टर बन जाएंगी।

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