कविता

/ समानता /

ये नहीं जानते
समानता का अर्थ
अपनी भूख मिटाने की
रोजी – रोटी की तलाश है
धूप – छाह भूलकर
सुबह से शाम तक
अपने पेट को दबाते
अश्रुजल में डूबते
पसीने में भीगते
दुःख – दर्द, पीड़ा – व्यथा में
अपनी – अपनी दौड़ है।

कभी नहीं मानेंगे वे
समता – ममता, भाईचारा
इंसानियत की गरिमा
वर्ण, वर्ग, नस्ल को फैलाते
जाति – धर्म को ही श्रेष्ठ मानते
सालों का यह छल – कपट
हर जगह जारी है
दूसरे करतूत को
अपने पल्ले में लेते
आराम की छाया में मशगूल होते
इनकी अपनी दर्जा है।

हम अक्षरवाले, स्याही के अधिकारी
सत्पथ के ईज़ाद के जिम्मेदार हैं
समतल के चिंतन में
वैश्विक चेतना का चेहरा
हर कोपलें में भर दें
रंग – बिरंगे उपवन में
सहकारिता की हरियाली भर दें
सामूहिक तत्व में
स्वार्थ का चिंतन भस्म करा दें
भोग को, रोग को
मिटाने का ईजाद दें।

परिचय - पी. रवींद्रनाथ

ओहदा : पाठशाला सहायक (हिंदी), शैक्षिक योग्यताएँ : एम .ए .हिंदी, एम.ए अंग्रेजी एम.फिल, पी.एच.डी शोधार्थी एस.वी.यूनिवर्सिटी तिरूपति। कार्यस्थान। : जिला परिषत् उन्नत पाठशाला, वेंकटराजु पल्ले, चिट्वेल मंडल कड़पा जिला ,आँ.प्र.516110 प्रकाशित कृतियाँ : वेदना के शूल कविता संग्रह। विभिन्न पत्रिकाओं में दस से अधिक आलेख। प्रवृत्ति : कविता ,कहानी लिखना, तेलुगु और हिंदी में । डॉ.सर्वेपल्लि राधाकृष्णन राष्ट्रीय उत्तम अध्यापक पुरस्कार प्राप्त।

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