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इंद्रेश भाई: विवाह की सालगिरह की बधाई

इंद्रेश भाई, सबसे पहले आपको विवाह की सालगिरह की कोटिशः बधाइयां और शुभकामनाएं. शैला जी और आपके लिए अथर्ववेद की प्रार्थना-
पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।
हम सौ शरदों तक देखें, यानी सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे (१)।
सौ वर्षों तक हम जीवित रहें (२);
सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, हम ज्ञानवान् बने रहे (३);
सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें, हमारी उन्नति होती रहे (४);
सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें पोषण मिलता रहे (५);
हम सौ वर्षों तक बने रहें (वस्तुतः दूसरे मंत्र की पुनरावृत्ति!) (६);
सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें (७);
सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें (८)।

यहां यह ज्ञातव्य है कि शरद् शब्द सामान्यतः छः वार्षिक ऋतुओं में एक के लिए प्रयुक्त होता है. चूंकि प्रति वर्ष एक शरद ऋतु आनी है, अतः उक्त मंत्रों में एक शरद् का अर्थ एक वर्ष लिया गया है. संयोगवश इस समय शरद ऋतु ही चल रही है.

सबसे पहले इंद्रेश भाई की जुबानी विवाह के बारे में इंद्रेश भाई के विचार-
डिजिटल सांझा विवाह (लघुकथा)
आदरणीय लीला दीदी, सादर प्रणाम! भारतीय समाज में विवाह मात्र दो व्यक्तियों का बंधन नहीं है. पूर्व में यह समस्त समाज का बंधन होता था, फिर मात्र परिवार का रह गया और अब तो मात्र दो व्यक्तियों का रह गया है. पहले विवाह समारोह में आप पास के सभी परिवार हर कार्य को आपस में बांट लेते थे. हमने भी विवाह में कुर्सियाँ लगाई हैं, भोजन परोसा है, पत्तल उठाये हैं. भोजन बनाने में सहयोग भी दिया है. बारातियों के सोने का प्रबंध पड़ोसियों के घरों में ही होता था. इस प्रकार से धन की बचत तो होती ही थी पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी की आपसी सम्बंध प्रगाढ़ होते थे. आत्मीयता का प्रवाह होता था. लॉकडाउन ने पुन: उन सम्बंधों को स्थापित कर दिया.
इंद्रेश भाई सचमुच ऐसे ही व्यवहार भी करते हैं. ब्लॉगिंग प्रेमी, पर्यटन प्रेमी, प्रकृति प्रेमी तो वे हैं ही, शतरंज के माने हुए खिलाड़ी भी हैं. इन सबमें व्यस्त रहने के कारण स्वभावतः घर में समय कम दे पाते हैं, फिर भी अपने विनम्र स्वभाव से गृहस्थी की गाड़ी को प्रेम और कुशलता से खींच रहे हैं.

इंद्रेश भाई के प्रकृति प्रेम को देखकर सुदर्शन भाई उन्हें ‘प्रकृति प्रेमी’ के संबोधन से ही संबोधित करते हैं. अपने प्रकृति प्रेम का परिचय वे पल-पल देते रहते हैं. हमारे ब्लॉग फाख्ता (लघुकथा) पर इंद्रेश भाई ने लिखा था-
”आदरणीय लीला दीदी हमारी गढ़वाली भाषा में घुग्गी को घुघुती कहते हैं. इसके उपर अनेक लोकगीत भी वहाँ प्रचलित हैं. “घुघुती घुरोण लगी म्यारा मैत की, ऐगी – एगी दौड़ी – दौड़ी ऋतु चैत की” अनुवाद यद्यपि कठिन नहीं है पर फिर भी लिख रहा हूँ “मेरे मायके की घुघुती घू घू की आवाज लगा रही है, चैत्र मास की ऋतु प्रारम्भ हो गयी है यह बता रही है.” एक अन्य गीत है इसका का विवरण मैंने अपनी एक कहानी “सती अनुसूया” में भी दिया है. “घुघुती न बासा, आम कि डाली मा घुघुती न बासा, तेर घुरु घुरू सुनी मै लागू उदासा,स्वामी मेरो परदेसा, बर्फीलो लदाखा, घुघुती ना बासाघुघुती ना बासा स्स्स्स, आमे कि डाली मा घुघुती ना बासा” अर्थात “हे घुघुती तू आवाज (गीत न गा) न कर, तेरी आवाज सुनकर मुझे अपने स्वामी (पति ) की याद आती है जो लद्दाख में परदेश में हैं” यह बहुत ही भावुक कर देने वाला गीत है. क्योंकि उत्तराखंड में अधिकतर युवा सेना में होते हैं और उनकी पत्नियाँ अपने पति की याद में डूबी रहती हैं. जब कोई शहीद हो जाता है तो उन युवा पत्नियोँ, उनके अगर बच्चे हों, माँ-पिता, भाई बहन के दु:ख का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता, विशेषकर पत्नी का दु:ख असहनीय और हृदयविदारक होता है.”
इस प्रतिक्रिया में आपने देखा कि इंद्रेश भाई की जानकारी कितनी सघन है. वे हर ब्लॉग को बड़े ध्यान से पढ़ते हैं और उससे संबंधित निजी जानकारी भी हमारे साथ साझा करते हैं.

एक रहस्य कथा पर इंद्रेश भाई ने लिखा था-
”इसमें मनोविज्ञान भी है. किसी को भावनात्मक रूप से आहत नहीं करना चाहिये. मुझे अपराध, रहस्य कथा पढ़ने का बहुत शौक था एक इस मंच पर लिखी भी थी “एक पुलिस वाले की डायरी से” एक लघु उपन्यास “गुमनाम है कोई” हिन्दी प्रतिलिपि डॉट कॉम पर लिखा है.” इस उपन्यास की साइट है-

hindi.pratilipi.com/story/गुमनाम-है-कोई-oemq8wmuls8m

आप पढ़ेंगे तो रोमांचित भी होंगे और रोचकता तो इंद्रेश भाई की लेखनी की विशेषता है ही.

इंद्रेश भाई के विचार हैं-
”वो हाथ सदा पवित्र होते हैं,
जो प्रार्थना से ज्यादा सेवा के लिए उठें.”
सेवा और समाज-सेवा वे बराबर करते आ रहे हैं. रोल मॉडल (लघुकथा) में इंद्रेश भाई ने लिखा था-
”आदरणीय लीला दीदी सादर प्रणाम! सकारात्म्क लोग सकारात्मकता का प्रकाश पुंज प्रज्ज्वलित कर नकारात्मकता के अंधेरे को दूर कर करते हैं. इस दीपावली अनेक परिचित मिले जिन्होंने बताया कि उन्होंने सड़क किनारे से दीपक खरीदे. एक युवक ने बताया कि उसे एक बुजुर्ग व्यक्ति सड़क किनारे दीपक बेचने के लिये खड़े दिखाई दिये तो उसने उससे सभी दीपक खरीद लिये. मेरी बेटियों ने भी यही किया. अच्छी बातों को लोग स्वीकार भी करते हैं और अपने जीवन में उनपर अमल भी करते हैं.”

इंद्रेश भाई के पूजनीय पिताजी उनके रोल मॉडल हैं. घर के सामने सड़क पर गड्ढा हो जाए तो उनके पिताजी तुरंत उसकी मरम्मत कर देते थे, इंद्रेश भाई भी पिताजी के नक्शेकदम पर चलकर ऐसे अनेक कार्य करते हैं. बड़ों का आदर-सम्मान कैसे करना है, यह इंद्रेश भाई के लेखों और प्रतिक्रियाओं की भाषा-शैली से ही आभास हो जाता है.

इंद्रेश भाई को पढ़ने का बेहद शौक है. उनकी निजी लाइब्रेरी भी समृद्ध है, जिसकी झलक उनके आलेखों और प्रतिक्रियाओं में दिखती है.
”चंपक और नंदन और चंदामामा हमारी पीढ़ी के लोगों ने अवश्य पढ़ी होगी. मेरा पढ़ने का शौक चंदामामा से प्रारंभ हुआ था. पड़ोसी के घर पर थी तब पढ़ी. खरीदने की आर्थिक स्थिति न थी. फिर सार्वजनिक पुस्तकालयों में चंपक व नदन भी पढ़ी थी. 5 किमी जाना और फिर वापसी मेरी लगन का परिचय स्वयं दे देती है.”

”मेरे लिये सरकारी नौकरी आराम से बिना काम किये वेतन पाने का अवसर नहीं अपितु राष्ट्र सेवा का अवसर था. इसी अनुसार ही कार्य किया विरोध भी झेला.”

बहुआयामी व्यक्तित्व वाले इंद्रेश भाई का छोटा-सा परिचय इस प्रकार है-
”एक पब्लिक सेक्टर से सेवानिवृत अधिकारी, बचपन से ही पढ़ने का शौक. राजनीति, खेल, भूगोल, इतिहास, साहित्य, आर्थिक गतिविधियों पर तथा पर्यावरण संरक्षण में रुचि. पहले फुटबाल, हाकी और क्रिकेट खेलता था, अब शतरंज खेलता हूँ. विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया.”
इंद्रेश उनियाल

शतरंज में तो इंद्रेश भाई अत्यंत माहिर हो गए हैं. अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के वे विजेता भी रहे हैं. अनेक पुरस्कार उनकी झोली में हैं.

इंद्रेश भाई पर्यटन प्रेमी भी हैं. मौका मिलते ही आज भी वे पर्यटन के लिए निकल जाते हैं.

इंद्रेश भाई जागरुकता के लिए सचेत रहते हैं, औरों को सचेत भी करते हैं.
”आदरणीय लीला दीदी, ग्राहक सेवा केन्द्र पर फोन लगाओ तो विकल्प आते हैं अंग्रेज़ी के लिये एक दबाएँ हिन्दी के लिये दो यहाँ भी हिन्दी को दूसरे स्थान पर रखा गया है. इसके बाद भी अनेक बार हिन्दी के स्थान पर उधर से अंग्रेज़ी में बात की जाती है तो में तो आपत्ति कर देता हूँ, फिर उन्हें हिन्दी में ही बात करनी पड़ती है, यह मेरा छोटा-सा प्रयास है. आप ने ध्यान दिया होगा कि मेरे लेखों में अब निरंतर हिन्दी के साहित्यिक शब्दों की संख्या में वृद्धि हुई है. इस दिशा में प्रयास कर रहा हूँ. त्रुटियाँ न्यूनतम हों इसका प्रयास करता हूँ. पर फोन को फोन ही लिखूंगा क्योंकि संज्ञा का अनुवाद नहीं होता. रेल को रेल ही लिखूंगा, न कि उपहास उड़ाने के लिये लौहपथ गामिनी. इस प्रकार के अनुवादों ने हिन्दी का विनाश ही किया है. सादर प्रणाम सहित.”

बात साहित्यिक ब्लॉग्स की चल निकली है, तो बताते चलें, कि इंद्रेश भाई के बहुत-से साहित्यिक ब्लॉग्स भी आ चुके हैं, जो बहुत पसंद किए गए हैं. इंद्रेश भाई के ब्लॉग्स की सबसे बड़ी विशेषता है- ब्लॉग्स के नवीनतम विषय और शोध पर आधारित ब्लॉग्स. इंद्रेश भाई ब्लॉग लिखने के लिए पहले गहन शोध करते हैं. अभी हाल ही में उनके कुछ ब्लॉग्स इस प्रकार हैं-
मानव बुद्धिमत्ता बनाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता- रोबोट सॉफ्टवेयर पर आधारित
भू जनित व्याधियाँ- जियोपैथिक तनाव पर आधारित
ग्रेटा थनबर्ग बनाम सालुमरादा थिम्मक्का- पर्यावरण बचाओ आंदोलन पर आधारित
मार दिया जाय या छोड़ दिया जाय!- लक्ष्मी छाया पर आधारित

शतरंज पर उनके अनेक ब्लॉग्स आ चुके हैं. इंद्रेश भाई के ब्लॉग्स विषय की गंभीरता को समेटे हुए भी रोचकता से भरपूर होते हैं. इन ब्लॉग्स के शीर्षक इतने दिलकश होते हैं, कि देखते ही पढ़ने को जी ललचाए. जैसे- ‘यूँ ही कोई मिल गया था’ ‘आधुनिक युग के सूरदास – रवीन्द्र जैन’ आदि.

इंद्रेश भाई पर लिखे हमारे कुछ ब्लॉग्स इस प्रकार हैं-
साहित्य के शैदाई: इंद्रेश भाई
संयोग पर संयोग-8
फिर सदाबहार काव्यालय- 36
सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन- 1
ज्ञातव्य है कि इंद्रेश भाई अपने को कवि नहीं मानते, फिर भी प्रयास करके एक नायाब कविता लिख दी, जिससे हमारे सदाबहार काव्यालय: तीसरा संकलन का आगाज़ हुआ. इससे पहले भी इंद्रेश भाई अनेक सदाबहार काव्य-रचनाएं लिख चुके हैं.

इंद्रेश भाई, आपने हम पर एक ब्लॉग लिखा था-

”लीला तिवानी: ब्लॉगिंग की दुनिया में अभिनव प्रयोग”

यह सचमुच आपका अभिनव प्रयोग था, जो कि अत्यंत नायाब प्रयास सिद्ध हुआ. एक तो हमारी लेखनी आप जितनी सशक्त नहीं है, दूसरे आपके लेखन का कैनवास बहुत बड़ा और गहन है, कि एक्ब्लॉग में सब कुछ समेटना मुश्किल है. आपका ज्ञान भी गहन, शोध भी गहन और प्रस्तुति भी गहन. हमने एक छोटा-सा प्रयास किया है. इसके साथ ही आपको एक बार फिर विवाह की सालगिरह की कोटिशः बधाइयां और शुभकामनाएं.

चलते-चलते
इंद्रेश भाई की गहनता बढ़ाने के प्रयास की झलक-
”आदरणीय लीला दीदी सादर प्रणाम! आजकल में अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील हूँ. पहले चेस डॉट कॉम पर मेरी रेटिंग 1700 होती थी. जो कम समय के अधिक खेल खेलने से गिरकर 1300 के पास पहुंच गयी थी अब मेरा लक्ष्य 1500 को 30 मिनट के खेल में प्राप्त करना था. और वह लक्ष्य प्राप्त हो गया. अब 1600 का लक्ष्य है. अन्य साइट पर मेरी रेटिंग 1950 से ऊपर है.”

इंद्रेश भाई, आपका यह सद्प्रयास जारी रहे. आज परिणय दिवस पर असीमित शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए हमारे हर्ष की कोई सीमा नहीं है. हम ईश्वर से आप दोनों के सुखमय, समृद्धिशाली और खुशहाल पारिवारिक जीवन की कामना करते हैं. आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, शतायु हों.

इंद्रेश उनियाल का ब्लॉग-

https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/author/indreshuniyalyahoo-com/

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “इंद्रेश भाई: विवाह की सालगिरह की बधाई

  1. इंद्रेश भाई: विवाह की सालगिरह की बधाई————
    “शादी की सालगिरह की ढेरों बधाई; प्रेम और विश्वास की है ये कमाई; भगवान करे आप दोनों सदा खुश रहें; आदर, सम्मान, और प्रेम प्रतिष्ठा जीवन में बहे।” हैप्पी एनिवर्सरी! “ईश्वर करे ऐसे ही आती रहे आपकी वर्ष गांठ; आपका रिश्ता प्यार का छुए नया आकाश; ऐसे महके जीवन का हर पल, जैसे हर दिन हो त्यौहार।” सालगिरह मुबारक!

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