भाषा-साहित्य

डॉ. लक्ष्मी नारायण ‘सुधांशु’

हिंदी साहित्य में डॉ. नगेन्द्र के बाद ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ को समृद्ध करनेवाले और कोई समालोचक हैं, तो वह है– डॉ. लक्ष्मी नारायण सिंह ‘सुधांशु’ । मूल नाम डॉ. लक्ष्मी नारायण सिंह, फिर ‘सुधांशु’ उपनाम के बाद सीधे डॉ. लक्ष्मी नारायण ‘सुधांशु’ हो गए !

पूर्णिया के इस लाल ने कई आलोचनाओं पर कार्य किए, मैंने उनकी ‘काव्य में उर्मिला-विषयक उदासीनता’ को गहराई से पढ़ा है । डॉ. सुधांशु जी स्वतंत्रता सेनानी भी थे । पूर्णिया का ‘कला भवन’ बनने में उनके अवदान भी शामिल हैं । ये प्रखर राजनेता भी थे ।

बिहार विधान सभा के दूसरे विधान सभाध्यक्ष भी रहे । आज सुधांशु जी नहीं है, किन्तु उनके पुत्र डॉ. पद्म नारायण सिंह उनके विरासत के उत्तराधिकारी हैं । कहते हैं, फणीश्वरनाथ रेणु के प्रखर आलोचक थे वे !

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

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