राजनीति

शिक्षक

बिहार सरकार का मानना है– ‘शिक्षक राष्ट्र – निर्माता नहीं होता है और अगर होते भी होगें, तो नियोजित शिक्षक तो कतई नहीं है’ । आखिरकार बिहार सरकार माननीय पटना उच्च न्यायालय के ‘समान काम के समान वेतन’ के फैसले के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायालय चला ही गया यानी नियोजित शिक्षकों को समान काम का समान वेतन मिलने से रहा !….. ‘समान काम का समान वेतन’ तथ्य के पक्षधर रहे और 20 महीने तक बिहार की सत्ता में रहे लालूजी, तेजस्वी जी, सिद्दीकी जी, पूर्वे जी इत्यादि जी ने तो इस बारे में कुछ नहीं किये । जब इतने ही दिनों सुशील मोदी जी और इनके मित्र सत्ता से बाहर रहे, तो गाहे-बगाहे कहा करते थे– सत्ता में लौटने पर नियोजित शिक्षकों को ‘समान काम का समान वेतन’ मिलेगा, किन्तु सत्ता पाते ही इस वस्तुस्थिति पर ताला जड़ लिये । नौ माह सत्ता में रहे बड़बोले माँझी जी भी इस सम्बंध में कुछ नहीं कर पाये ! क्या ये सभी सत्ता हासिल करने के लिए यह सब किया करते हैं । अपना विधुर मुखिया जी इन नियोजित शिक्षकों को 2006 में नियमावली बनने के साथ ही अनादर करते आये हैं ! कहते हैं, ये संविदाकर्मी हैं, जैसे वे सत्तासन हैं पाँच वर्षों के लिए ! ….. और नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति पंचायत व्यवस्था के तहत हुई है, किन्तु वे – शासन, प्रशासन इत्यादि फिर तब इनमें शामिल क्यों हैं ? क्यों इनके कार्यक्रम पदाधिकारी विद्यालय के बाहर 9 AM से पहले खड़े रहते हैं, तो 4 PM बजने के 5 मिनट पहले विद्यालय में आ धड़कते हैं, ये अफ़सरान के जिम्मे शिक्षा प्रसार नहीं, बल्कि ये नियोजित शिक्षकों को वेतन काटने के उद्देश्य से ऐसी हरकतें करते हैं । आपके कैबिनेट में करोड़ों की सम्पत्तिधारक वज़ीर हैं, फिर भी वे वेतन उठाते हैं । माननीय संसद-विधान मंडल सदस्यों के वेतन कम हुए, तो वेतन-वृद्धि की चर्चा पर सभी माननीय एकजुट हो गए और अत्यधिक वेतन पारित भी करवा लिये, क्योंकि कानून के catalyst हैं आप ! कानून के dictator हैं आप ! आप से बिहार बनता है, भारत बनता है, जग बनता है और आप से राष्ट्र निर्माण होता है । आपकी नज़र में शिक्षक राष्ट्र – निर्माता नहीं ! वो तो आप हैं ! आपको किसी शिक्षक ने नहीं पढ़ाया, बल्कि आप अभिमन्यु हैं, पेट से ही सीखकर आये हैं ?
आप क्यों नहीं साईकिल में घूमते हैं ? आप क्यों क्लीनसेव करते हैं या चाप या फ्रेंचकट दाढ़ी रखते हैं । बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ अपना जीवन-स्तर सुधारना भी जहां शिक्षक का दायित्व है । उनके भी जैविक बच्चे हैं, जो डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनने के सपने पालते हैं ! कैसे बनेंगे वे ? कभी सोचा है आपने ? जब नियोजित शिक्षकों की उम्र 60 साल पार कर जाएंगे, तो कैसे जीयेंगे ? कभी सोचा है, आपने ! आपकी सेवा 5 वर्षों की है और उनकी 60 वर्षों तक…. । आप माननीयगण तो ‘पेंशन’ भी उठा लेते हैं और इस पेंशन का उल्लेख संविधान में नहीं है ! क्या यह गैर-संवैधानिक कृत्य नहीं है, जो कि आप उच्चतम न्यायालय जाकर यह रोना रोते हैं कि नियोजित शिक्षकों को इतने पैसे कहाँ से दूँगा ? … तो फिर आप सभी मिलकर करोड़ों रुपये वेतन, भत्ता व पेंशनादि के रूप में कैसे ले लेते हैं ? पहाड़ जैसे वेतन तो आप उठाते हैं, कहते हैं ये नियोजित शिक्षक ‘विरागी’ हो जाय ! अगर आप किसी न किसी शिक्षक से पढ़े हैं तो सभी माननीय मिल अपने-अपने वेतन-पेंशन आदि को ‘नियोजित शिक्षकों’ के लिए दान कर दीजिए ! एक परिवार में अपने बच्चों को अगर अभिभावक अपनी संपत्ति का समान वितरण नहीं करते हैं या कम आय प्राप्त करने वाले बच्चों के भाग्य को कोसते हैं, तो तय मानिए, ऐसे माँ-बाप का बुढ़ापा अत्यंत दुःखद होता है, तो ऐसा तभी हुआ है, जब वे अपने-अपने संतानों को एकसमान न देखा होगा, जैसा आप देख रहे हैं !
ईश्वर अगर सचमुच है, तो वे आपको सद्बुद्धि दे !

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

Leave a Reply