लघुकथा

वरदान

”राधे झूलन पधारो, झोंटे देवें है कन्हाई.” मोनिका झूल रही थी, साथ में गा भी रही थी. सिर्फ मोनिका ही नहीं मोनिका का मन भी झूल-झूम रहा था.

”कितनी अच्छी थीं मेरी हिंदी और गणित की अध्यापिकाएं!” मोनिका 60 साल पहले 1960 के समय में पहुंच गई थीं.

”हिंदी की अध्यापिका ललिता द्रविड़ थीं और गणित की शांता द्रविड़. दोनों बहने थीं. ललिता मैम जहां अपने नाम के अनुरूप लालित्य की साक्षात प्रतिमा थीं, वहीं शांता मैम के स्वभाव में शांति नाम का कोई चिह्न दिखाई नहीं देता था. उग्र स्वभाव की शांता मैम की यही उग्रता मोनिका के लिए वरदान बन गई थी.” मोनिका का मन हिंडोले ले रहा था.

”इतनी सिली मिस्टेक कैसे करती हो मोनिका! जानती हो कि पूरी कक्षा में एक तुम ही हो, जो बोर्ड की परीक्षा में गणित में शत प्रतिशत अंक ला सकती हो!” मोनिका चुपचाप शांता मैम की डांट सुनती रहती. ”सोचो छोटे-से गांव की लड़की बोर्ड की परीक्षा में गणित में शत प्रतिशत अंक ला सके, तो तुम्हारे साथ इस छोटे-से गांव की किस्मत भी बुलंद हो जाएगी! बस थोड़ा-सा ध्यान से सवाल हल करो और सिली मिस्टेक्स से बचो.”

”मैम कभी-कभी ध्यान भटक जाता है.” अल्हड़ किशोरी मोनिका ने मासूमियत से कहा था.

”ऐसा करो, तुम्हारा घर तो बनास नदी के किनारे पर है. वहां बड़े-बड़े बरगद के पेड़ लगे हुए हैं. शाम को तनिक बरगद के पेड़ पर लगे झूले में झूल लिया करो, मांसपेशियों का व्यायाम हो जाएगा, मानसिक तनाव से मुक्ति मिल जाएगी और ध्यान भटकने से बच जाएगा.”

मोनिका ने सचमुच ऐसा ही किया था. नतीजा शांता मैम की आशाओं के अनुरूप आया था. कई समाचार पत्रों मे उसका उल्लेख हुआ था.

मोनिका ने अपनी छात्राओं पर भी ऐसा ही प्रयोग किया था. पांच बार मोनिका को शिक्षा विभाग द्वारा छात्राओं के अच्छे परिणाम के लिए तथा दो बार नवाचार पर आधारित शोधपत्र प्रतियोगिता में सफलता के लिए पुरस्कृत व सम्मानित किया गया था.

उम्र का वार्धक्य आज भी मोनिका के झूले के प्यार को कम नहीं कर पाया था. अब वह पैरों पर दबाव डालकर झोंटे लेती है और पेड़ की शुद्ध ऑक्सीजन उसकी निष्क्रिय मांसपेशियों को मजबूती देती है.

अपने आप को खुशी देने के लिए झूलना आज भी उसके लिए वरदान बन गया है.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “वरदान

  • लीला तिवानी

    जिस प्रकार चलना-सैर करना तन-मन के लिए अच्छा व्यायाम है, विचार विमर्श करना मस्तिष्क को जंग न लगने देने के लिए अच्छा व्यायाम है, शतरंज या अन्य गेम खेलना ध्यान लगाने के लिए अच्छा व्यायाम है, उसी प्रकार झूलना भी तन-मन-मस्तिष्क के लिए अच्छा व्यायाम है. समय और सामर्थ्य के अनुसार ये व्यायाम करना लाभप्रद होकर वरदान बन जाते हैं.

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