कविता

बदलाव

छंट जाने दो कुहासा बीत जाने दो निराशा
कि नया साल आया है…..
सपनों के उड़नखटोले को उमंगों के पंख लगा कर
उड़ जाने दो कि नया साल आया है…..
रीते रहे हैं कई गागर, प्यासे रहे हैं कई सागर
नैनो के नीर वह जाने दो, कि सूख ना पाए सागर,
दिल का बोझ कम हो जाने दो
कि नया साल आया है….
कुचली हुई आशा, दबी हुई पिपाशा
मिल जाये इन्हें आवाज़, इन सहमे हुए पंखों को परवाज़,
आशा निराशा का खेल रुक जाने दो
कि नया साल आया है….
मचले हुए ज़ज्बात, सिसकते हुए हालात
बदल जाने दो, ढल जाने दो अब गम की रात
कि नया साल आया है…..।
बह जाने दो अब बदलाव की बयार
कि नया साल आया है….।

— अमृता पांडे

अमृता पान्डे

मैं हल्द्वानी, नैनीताल ,उत्तराखंड की निवासी हूं। 20 वर्षों तक शिक्षण कार्य करने के उपरांत अब लेखन कार्य कर रही हूं।