लघुकथा

बहार खिल उठी थी!

वीरेन की वीरान जिंदगी में बहार आ गई थी.

कुछ दिन पहले ही वह बड़ी मग्नता से अपने खेतों में हल चला रहा था. उसके दोनों प्यारे-प्यारे बैल गोलू-मोलू भी खुश नजर आ रहे थे. तभी एक नौजवान बड़ा-सा कैमरा संभाले आया और उसने वीरेन का फोटो उतारकर वीरेन को दिखाया. फोटो देखकर वीरेन हैरान हो गया था-
”बचवा, का हम, हमारे खेतवा और हमारे बैलवा इतने खबसूरत दिखें सै!”

”कैमरा झूठ नहीं बोलता. फिर अन्नदाता और उनके बैल-खेत तो होते ही खूबसूरत हैं. और हां चाचा जी, आपने इन बैलों के मुख पर मास्क क्यों लगा रखा है?”

”बचवा, मास्क-वास्क तो हम जानत नाहीं, बस ये हर वक्त मुंह न मारने लग जाएं, इसलिए इनके मुख पर पर्दा डाल देत हैं, जब हम खावत हैं, इनको भी खिलाने की खातिर ये पर्दा हटा देत हैं. बड़े समझदार हैं मेरे गोलू-मोलू, तभी रंभाकर कुछ खाने को मांगत हैं.”

कहकर वीरेन उसको फोटो खिंचवाने के 5000 रुपये देकर चल पड़ा था. 5000 रुपये माथे से छुआकर वीरेन ने भगवान के शुकराने किए थे.

”अरी भागवान कहां हो? सुनती हो! ये देख अपने गोलू-मोलू का कारनामा. आज की कमाई. आज तो कुछ मीठा बना दे!” चमकती आंखों से 5000 रुपये दिखाकर उसने कहा था.

”चाचा जी, ये नए कपड़े आपके और चाची जी के लिए लाया हूं. आपके उस दिन के फोटो ने कमाल कर दिया. मुझे पांच लाख का इनाम लगवा दिया. आप ये 51000 रुपये रखिए. इन्हें बैंक में जमा करवा दीजिएगा. अभी और भी पैसे आएंगे.” आज फिर वही नौजवान आया था.

बहुत हैरान-सा वीरेन ज्यादा कुछ समझ नहीं पाया. ”कैसे पैसे बचवा?” बस इतना ही बोल पाया.

”चाचा जी, आपके खेत की खूबसूरती ने फिल्मवालों का मन मोह लिया है, वे यहां नाच-गाना फिल्माने आएंगे.”

”बचवा हमारे खेतन को कछु नुकसान तो नहीं पहुंचेगो?” वीरेन की चिंता जायज थी.

”नहीं चाचा जी, वो सब मैं देख लूंगा. और हां कपड़ों के साथ मास्क भी हैं, आप और चाची जी लगाकर नाच-गाना देखिएगा. कोई बीमारी फैली हुई है न!” अपना मास्क दिखाते हुए कहा.

वीरेन कभी नए कपड़ों के बैग को, कभी अपने खूबसूरत खेतों-बैलों को देखता ही रह गया.

नया साल शुरु होने को था. बहार खिल उठी थी!

ब्लॉग संख्या- 2800

चलते-चलते

जेमिनी अकादमी के सौजंन्य से एक सम्मान पत्र प्राप्त हुआ है-
2020- रत्न सम्मान

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “बहार खिल उठी थी!

  1. वक्त जैसा भी हो गुजर जाता है. कितनी भी धुंध हो, धुंध के बाद धूप खिल उठती है. किसान के जीवन में बहार खिल उठी थी

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