लघुकथा

देहदान

परिवार की पुरानी एलबम देखते-देखते अचानक दादी-दादा जी की खुद द्वारा खींची गई एक तस्वीर देखकर मनीषा अतीत की विस्मृतियों में खो-सी गई.

”कितनी प्यारी लग रही है दादी-दादा जी की यह जोड़ी! जीवन की सांध्य-वेला में सिडनी की सांध्य-वेला के चांद को निहारते हुए, लिए हाथों में हाथ, निभाते हुए एक दूसरे का साथ.” मनीषा ने तस्वीर पर हाथ फेरा, मानो दादी-दादा जी को प्यार कर रही हो.

”बिलकुल रोमियो-जुलियट. नहीं, रोमियो-जुलियट नहीं, उनके न मिल पाने, एक दूसरे का प्यार न पा सकने की कहानी तो बड़ी करुण थी. उनका अंत भी कितना कारुणिक! दादी-दादा जी तो ऐसा अंत चाहते ही नहीं थे!” उसके विचार आगे बढ़ चले.

”मुस्कुराते हुए 50 साल एक साथ जिंदगी बिताने का हौसला लिए हुए उन्होंने जिंदगी की कितनी खुशियां एक साथ देखी थीं! बच्चे होना, बच्चों की शादियां होना, बच्चों के बच्चे होना, बच्चों के बच्चों की शादियां होना.”

”सिर्फ खुशियां ही नहीं, गम भी उन्होंने होनी को बलवान मानकर मुस्कुराते हुए झेल लिए थे. मुझे जन्म देकर ममा का चले जाना और पापा का तिल-तिल घुटते हुए अकेले 24 वर्ष काटना उन्होंने देखा था. चाचा जी का शरीर शांत हो जाने पर चाची जी की निस्पंदता को भी उन्होंने शिद्दत से महसूस किया था.”

”जीवन-साथी के बिना जीना भी क्या जीना और कैसा जीना!” वे कहते थे.

”साथ जिएंगे, साथ मरेंगे.” कई बार उनसे वह सुन चुकी थी.

”हुआ भी तो यही! एक दिन दादी जी बीमार पड़ीं, दूसरे दिन दादा जी. दोनों एक ही अस्पताल के अलग-अलग कमरों में.” मनीषा के सामने वह दृश्य जीवंत हो गया था.

”आपके दादा जी की सांस उखड़ रही है.” नर्स ने आकर कहा था. मनीषा दादा जी के कमरे में भागी थी. जब तक पहुंची, दादा जी जा चुके थे.

अश्रु बहने को ही थे कि एक और नर्स ने आकर सूचना दी-
”आपकी दादी जी अब नहीं रहीं.” मनीषा सहित सब सन्न थे.

”कितना शांत अंत और वह भी साथ-साथ!” मनीषा के मुंह से अकस्मात निकला था.

”पूर्व निर्धारित प्रण के मुताबिक देहदान के लिए दोनों के स्ट्रेचर साथ-साथ चल रहे थे.”

”देहदान! मरकर भी जग का कल्याण!” मनीषा ने भी देहदान के लिए फॉर्म डाउनलोड करने के लिए लैपटॉप खोल लिया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “देहदान

  1. ”देहदान! मरकर भी जग का कल्याण!” कितना महान संकल्प था और वह भी साथ-साथ! ”साथ जिएंगे, साथ मरेंगे.”

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