कविता

संस्कार देश की पूंजी है

क्या सिर्फ कहने भर की
रह गयी ये बात अब
संस्कार देश की पूंजी है….
गमगीन आँखों में आँसूं लिये अपने परिजन को करने विदा गए सगे संबंधी
और श्मशान की छत धराशायी
होने से कई जान गंवा बैठे कई हुए घायल
क्या भरना बड़ा खामियाजा उन्हें लालच , भ्रष्टाचार में लिपटे उन लोगों के कारण जिन्होंने किया उसका निर्माण कार्य
चंद रुपयों की खातिर कर लेते कैसे सौदा ये बेईमान मासूम की जानों का
कर घटिया निर्माण कभी पुल, फ्लाईओवर , सड़क, स्कूल , घर और अब तो छोड़ा नहीं श्मशान घाट भी
कैसे संस्कार ये कैसी देश की पूंजी
वहीं कोई करता हुंकार भर धर्म का प्रचार
जिस से बस भरती नफरत और द्वेष
कहीं मनमानी बस कर लागू नियम कानून
कड़कती ठंड , तेज़ हवा, बारिश में सड़कों पर महीने भर से बैठे किसान हर उम्र के
बेहाल
पर अड़े  हैं शासक और शासन दोनों ही
क्यों थोपना यूँ लोगों पर अपनी निजी सोच बैठ ऊंची कुर्सी पर
ऐसे क्या चलेगा देश इन खोखले संस्कारों पर बन पूंजी चंद हाथों की
जहां कोई वर्ग ,न वृद्ध, न युवा, न स्त्री, न पुरूष कोई भी खुशहाल नहीं
हर तरफ बस बेबसी, लाचारी
और दुहाई
ऐसे में कैसे संस्कार बने देश की पूंजी
जहां कोई भी रौंद दे इज़्ज़त
कर मनमानी
न देखे मासूम बचपन, न युवा , न प्रौढ़
बस अंधा उन्माद , अंधा खुमार
जिसने किये कई बड़े छोटे घिनौने कांड
….इस तरह बस तरफ है अराजकता, बदहाली जिसमें
गम हुई सभ्यता, संस्कार, इंसानियत।।
— मीनाक्षी सुकुमारन

परिचय - मीनाक्षी सुकुमारन

नाम : श्रीमती मीनाक्षी सुकुमारन जन्मतिथि : 18 सितंबर पता : डी 214 रेल नगर प्लाट न . 1 सेक्टर 50 नॉएडा ( यू.पी) शिक्षा : एम ए ( अंग्रेज़ी) & एम ए (हिन्दी) मेरे बारे में : मुझे कविता लिखना व् पुराने गीत ,ग़ज़ल सुनना बेहद पसंद है | विभिन्न अख़बारों में व् विशेष रूप से राष्टीय सहारा ,sunday मेल में निरंतर लेख, साक्षात्कार आदि समय समय पर प्रकशित होते रहे हैं और आकाशवाणी (युववाणी ) पर भी सक्रिय रूप से अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं | हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रहों .....”अपने - अपने सपने , “अपना – अपना आसमान “ “अपनी –अपनी धरती “ व् “ निर्झरिका “ में कवितायेँ प्रकाशित | अखण्ड भारत पत्रिका : रानी लक्ष्मीबाई विशेषांक में भी कविता प्रकाशित

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