कविता

वादियों की छाँव में

वादियों की छाँव में जो वक्त गुजरा
कितना शकून भरा था वो पेड़ो से भरा प्रकृति का किनारा,,
कुछ पल ही सही कितना हसीन था वो नजारा, ।
जीने की राह जो भी हो मुद्दतों बाद इक साथ
हसीन वादियों में जो ये वक्त गुजरा
सदियों से था तुम्हारा इन्तजार
जो ये वादियों ने हमें पुकारा,,।।
जमाने की भीड़ ने हमें रूसवा किया
पर जन्नत की इस मिट्टी ने हमें
महसूस किया, हम कहीं भी रहें
पर ये वादियों की जम़ी ने हमें
अपने आँचल में जो दिया सहारा,।
कितना खूबसूरत था वो समां
जो हमने एक साथ गुजारा
पेड़ो की छाँव में पत्तों की आड़ में
चारों तरफ वादियों में शकून भरा था
वो नजारा,,,दो ह्रदयों का इस तरह मिलन और
प्रकृति के अद्भुत सौन्दर्य के साथ मिलना, दद॔ बहुत था पुराना
पर प्रकृति को जो मुसकुराते हुए देखा
तो खुद को भुला दिया,
और ले लिया तुम्हारे ह्रदय का सहारा,,
कितना ह्रदय स्पर्शनीय और मनमोहक था
वो दृश्य और वो नजारा,,जो हमनें पल भर ही सही
पर एक साथ तो गुजारा।

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)