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उठो जागो और अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुको मत – स्वामी विवेकानंद

युवाओं के शक्तिपुंज, आदर्श तथा प्रेरक युगदृष्टा संत स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता के दत्त परिवार में 12 जनवरी 1863 ई को हुआ था। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कई गुणों से विभूषित थे। वे अंग्रेजी एवं फारसी भाषाओं में दक्ष थे। बाइबल उनका पसंदीदा ग्रंथ था। स्वामी जी के पिता संगीत प्रेमी भी थे। अतः पिता विश्वनाथ की इच्छा थी कि उनका पुत्र नरेंद्रनाथ भी संगीत की शिक्षा ग्रहण करें। स्वामी विवेकानंद की माता बहुत ही गरिमामयी व धार्मिक रीति-रिवाजों को माननेवाली महिला थीं। उन्हें देखकर लगता था कि वे मानो किसी राजवंश की हों। ऐसे सहृदय परिवार में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ और फिर उन्होनें सारे संसार को हिलाकर रख दिया तथा भारत के लिए महिमा और गरिमा से भरे एक नये युग का सूत्रपात किया।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्वामी विवेकानंद की सबसे ऊंची प्रतिमा देश को समर्पित की थी। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने युवाओं को संबोधित भी किया था और युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों के बारे में गहनता से बताते हुए वर्तमान के संदर्भ में जोड़ा भी था। कार्यक्रम के दौरान कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों ने मोदी गोबैक के शर्मनाक नारे भी लगाये। पीएम ने एक प्रकार से स्वामी जी के विचारों को नये और वर्तमान समय के अनुरूप प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की। यह मूर्ति देखने के लिए सभी को दिल्ली अवश्य जाना चाहिए।
यह बालक नरेंद्र नाथ बचपन से ही बहुत शरारती थे, लेकिन इनमें अशुभ लक्षण नहीं दिखायी पड़ रहे थे। सत्यवादिता उनके जीवन का मेरूदण्ड थी। वे दिन में खेलों में मग्न रहते थे और रात्रि में ध्यान लगाने लगे थे। ध्यान के दौरान उन्हें अदभुत दर्शन प्राप्त होने लगे। समय के साथ उनमें और परिवर्तन दिखलायी पड़ने लगे। वे अब बौद्धिक कार्यों को प्राथमिकता देने लगे। पुस्तकों का अध्ययन प्रारम्भ किया और नियमित रूप से समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का गहन अध्ययन करने लगे थे। सार्वजनिक भाषणों में भी उपस्थित रहने लगे तथा बाद में उन भाषणों की समीक्षा करने लगे। वे जो भी सुनते थे उसे अपने मित्रों के बीच वैसा ही सुनाकर सबको आश्चर्यचकित कर देते थे। उनकी पढ़ने की गति भी बहुत तीव्र थी तथा वे जो भी पढ़ाई करते उन्हें अक्षरशः याद हो जाया करता था। पिता विश्वनाथ ने अपने पुत्र की विद्वता को अपनी ओर खींचने का प्रयास प्रारम्भ किया। वे उसके साथ घंटों ऐसे विषयों पर चर्चा करते जिनमें विचारों की गहराई, सूक्ष्मता और स्वस्थता होती।
बालक नरेंद्र ने ज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नति कर ली थी। उन्होंने तत्कालीन एंट्रेस की कक्षा तक पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य के सभी गं्रथों का अध्ययन कर लिया था। उन्होंने सम्पूर्ण भारतीय इतिहास व हिंदू धर्म का भी गहन अध्ययन कर लिया था। कालेज की पढ़ाई के दौरान सभी शिक्षक उनकी विद्वता को देखकर आश्चर्यचकित हो गये थे। अपने कालेज जीवन के प्रथम दो वर्षों में ही पाश्चात्य तर्कशास्त्र के सभी ग्रंथों का गहन अध्ययन कर लिया था। इन सबके बीच नरेंद्र का दूसरा पक्ष भी था। उनमें आमोद-प्रमोद करने की कला थी, वे समाजिक वर्गों के प्राण थे। वे मधुर संगीतकार भी थे। सभी के साथ मधुर व्यवहार करते थे। उनके बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं होता था। उनके मन में सत्य को जानने की तीव्र आकांक्षा पनप रही थी। वे सभी सम्प्रदायों के नेताओं के पास गये, लेकिन कोई भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सका।
1881 में नरेंद्र नाथ पहली बार रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये। रामकृष्ण परमहंस मन में ही नरेंद्र को अपना मनोवांछित शिष्य मान चुके थे। प्रारम्भ में वे परमहंस को ईश्वरवादी पुरूष के रूप में मानने को तैयार न थे। पर धीरे-धीरे विश्वास जमता गया। रामकृष्ण जी समझ गये थे कि नरेंद्र में एक विशुद्ध चित्तसाधक की आत्मा निवास कर रही है। अतः उन्होंने उस युवक पर अपने प्रेम की वर्षा करके उन्हें उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूति के पथ में परिचालित कर दिया। 1884 में बी.ए. की परीक्षा के दौरान ही उनके परिवार पर संकट आया जिसमें उनके पिता का देहावसान हो गया। 1885 में ही रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ जिसके बाद रामकृष्ण जी ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी तथा उसके बाद ही उनका नाम स्वामी विवेकानंद हो गया। 1886 में स्वामी रामकृष्ण ने महासमाधि ली। वे स्वामी विवेकांनद को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गये। 1888 के पहले भाग में स्वामी विवेकानंद मठ से बाहर निकले और तीर्थाटन के लिए निकल पड़े। काशी में उन्होंने तैलंगस्वामी तथा भास्करानंद जी के दर्शन किये। वे सभी तीर्थों का भ्रमण करते हुए गोरखपुर पहंुचे। यात्रा में उन्होंने अनुभव किया कि आम जनता में धर्म के प्रति अनुराग में कमी नहीं है। गोरखपुर में स्वामी जी को पवहारी बाबा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। फिर वे सभी तीर्थों, नगरों आदि का भ्रमण करते हुए कन्याकुमारी पहुंचे। यहां श्री मंदिर के पास ध्यान लगाने के बाद उन्हें भारतमाता के भावरूप में दर्शन हुए और उसी दिन से उन्होंने भारतमाता के गौरव को स्थापित करने का निर्णय लिया।
स्वामी जी ने 11 सितम्बर 1893 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्मसभा में हिंदुत्व की महानता को प्रतिस्थापित करके पूरे विश्व को चैंका दिया। उनके व्याख्यानों को सुनकर पूरा अमेरिका उनकी प्रशंसा से मुखरित हो उठा। न्यूयार्क में उन्होनें ज्ञानयोग व राजयोग पर कई व्याख्यान दिये। उनसे प्रभावित होकर हजारों अमेरिकी उनके शिष्य बन गये। उनके लोकप्रिय शिष्यों में भगिनी निवेदिता का नाम भी शामिल है। स्वामी जी विदेशों में हिंदू धर्म की पताका फहराने के बाद भारत वापस लौटे। स्वामी विवेकानंद हमें अपनी आध्यात्मिक शक्ति के प्रति विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैंे। वे राष्ट्र निर्माण से पहले मनुष्य निर्माण पर बल देते थे। अतः देश की वर्तमान राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए देश के युवावर्ग को स्वामी विवेकानंद के विषय एवं उनके साहित्य का गहन अध्ययन करना चाहिये। युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अवश्य ही लाभान्वित होगी।
स्वामी विवेकानंद युवाओं को वीर बनने की प्रेरणा देते थे। युवाओं को संदेश देते थे कि बल ही जीवन है और दुर्बलता मृत्यु। स्वामी जी ने अपना संदेश युवकों के लिए प्रदान किया है। युवा वर्ग स्वामी जी के वचनों का अध्ययन कर उनकी उददेश्य के प्रति निष्ठा, निर्भीकता एवं दीन दुखियों के प्रति गहन प्रेम और चिंता से अत्यंत प्रभावित हुआ है। युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद के अतिरिक्त अन्य कोई अच्छा मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक नहीं हो सकता। नवीन भारत के निर्माताओं में स्वामी विवेकानंद का स्थान सर्वोपरि हैं। ऐसे महानायक स्वामी विवेकानंद ने 4 जुलाई 1902 को अपने जीवन का त्याग किया। स्वमी जी का एक नारा बहुत लोकप्रिय हुआ जो आज तक चला आ रहा है और वह है- ‘उठो जागो और अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुको मत।’
— मृत्युंजय दीक्षित

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