कविता

अभी जवां हूं मैं

उम्र तो है
आंकड़ों का खेल
अभी हूं जवां मैं
तन से मैं थका नहीं
मन से थका नहीं
थकना मेरी फितरत नहीं
झंझावतों से डरता नहीं
रुकना मैं जानता नहीं
बहता हुआ झरना हूं
धार हूं नदी की
बहा ले जाऊंगा
हर वो पत्थर
जो राह में रोड़ा
बनेगा मेरी