लघुकथा

अकबका

मैं भी अकबका कर बाहर निकलता हूँ कि अचानक ही  आखिर क्या हो गया ? मैंने जब इस छोटी-सी बात को जाना, तो माँ से कहा, ‘यह क्या माँ ! आज उपवास में हो, श्रीकृष्ण की श्रद्धा और भक्ति में लीन ! फिर मुँह से गाली निकाल रही हो, वह भी भद्दी-भद्दी । कम से कम उसे तो आज बख्श देनी चाहिए थी ।’

यह सुन माँ उल्टे मुझपर उबल पड़ी । मैंने भी प्रत्युत्तर में माँ को कह दिया, ”आपकी यह पूजा तो ‘मुँह में राम, बगल में छुरी’ लिए है ।”
लेकिन माँ चुप नहीं रही, उन्होंने कहा, ”तुम्हारी यह कहावत आज के प्रसंग में लागू नहीं हो सकती, कैसे कवि हो तुम ! तुकबंदी भी नहीं कर सकता ! कहावत सुनाना ही है, तो यह सुनाओ, ‘मुँह में कृष्ण, बगल में बकरी’ !”

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

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