भाषा-साहित्य

सजीवन साहित्य

साहित्य से सुसंचालित है समाज ! जिस जाति की सामाजिक अवस्था जैसी होती है, उसका साहित्य भी वैसा ही होता है । जातियों की क्षमता और सजीवता यदि कहीं प्रत्यक्ष देखने को मिल सकती है, तो उनके साहित्य -रूपी आईने ही में मिल सकती है।

इस आईने के सामने जाते ही हमें तत्काल मालूम हो जाता है कि अमुक जाति की जीवनी -शक्ति इस समय कितनी और कैसी है, साथ ही भूतकाल में कितनी और कैसी थी ? आप भोजन करना बंद कर दीजिए, आपका शरीर क्षीण हो जाएगा और कदाचित नाशोन्मुख होने लगेगा !

इसीतरह आप साहित्य के रसास्वादन से अपने मस्तिष्क को वंचित कर दीजिए, वह निष्क्रिय होकर धीरे -धीरे किसी काम का न रह जाएगा । सच ही, हमारी सामाजिक स्थिति -गति का प्रतिबिंब साहित्य में दिखाई देता है और साहित्य का प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ता है।

यथा-

‘सुंदरता’ तो सिरफ़ ‘जुगनूँ’ है,
अभी भक -भक,
तो अभी ही गायब !
मुझे तो….
असुन्दरता यानी कदर्य से प्यार है !

फिर-

दाढ़ी के बाल सफेद होने
शुरू हो गए हैं,
और तब कहीं मेरी जवानी
अंकुरित हुई है !

एवं

जब गुरु द्रोण नहीं मिले,
तब एकलव्य ने खुद के भीतर
टैलेंट पैदा करके क्या बुराई की ?
क्या खुद की प्रतिभा को
बाहर निकालना अपराध है?

फिर-

एक बात पूछ लूं…..
‘रात’ में जन्म लेनेवाले व्यक्ति
अपना ‘जन्मदिन’ मनाएंगे
या ‘जन्मरात’ !

 

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

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