कथा साहित्य कहानी

आखिरी मैसेज

मोबाइल फोन पर मैसेज देखकर, वह हैरान रह गया था। वंदना नाम पढ़ कर उसे यकीन नहीं हो था। फिर अपनी जिज्ञासा पूर्ति के लिए मैसेज में कौन लिख कर फॉरवर्ड कर दिया?उस समय कोई रिप्लाई नहीं आई। मैं घंटों उसके मैसेज का इंतजार करता रहा।बार-बार फोन चेक करता रहा। पर कोई उत्तर ना पाकर मैं निराश हो गया।
वंदना मेरा सब कुछ थी। कितने साल गुजर गए,मैं उंगलियों पर गिनने लगा?पूरे सात वर्ष, आज उसे मेरी याद कैसे आ गई थी? इतने साल पहले वह मुझें छोड़कर चली गई थी।तब तो उसने कहा था अब मैं तुमसे कभी बात नहीं करूँगी। हमारी राहे अलग है। तुमने मेरे मन को बहुत दुखाया है। हमारी आखिरी मुलाकात भी तो सेबों के बाग में भी हुई थी। उसने मुझें अपने सेब के बाग में बुलाया था। हम अक्सर वहीं मिलते थे।
मुझें सेब बहुत पसंद थे, जब भी हमारी मुलाकात होती। मैं बात करते-करते सेबो का आनंद लेता रहता था।वंदना भी तो सेब की तरह लाल थी। पहाड़ों में रहने वाले लोगों की रंगत  सेबों की तरह ही होती है। पेड़ों पर लटके सेब कितने सुंदर लगते हैं?
सेब के बागों के बीच महकती वंदना भी बहुत सुंदर लगती थी।उसका पहनावा भी गजब का था।हमेशा सिर पे गोल टोपी पहने रहती थी।ठण्ड तो उसे लगती ही नहीं थी। लगती भी कैसे वो उसका अपना घर संसार था?मैं ही पराया था, उसी के यहाँ काम करने वाला एक छोटा सा सहायक था। जब मैं नौकरी तलाश कर रहा था।तो मेरे दोस्तों ने कहा था, हिमाचल चला जा वहाँ बागों की देखरेख का काम जल्दी मिल सकता है।और वैसे भी मुझें पेड़-पौधे, हरियाली बहुत पसन्द थी।
पर मैं घर से दूर नहीं जाना चाहता था। हमारे प्रदेश में कौन सा काम की कमी थी?जो मैं वहाँ जाकर काम करूँ।पर दोस्तों ने मेरी बात बीच में ही काट दी थी। अरे वाह, हरियाली के साथ-साथ गोरी चिट्टी पारियाँ भी तो मिलेगी।अच्छा,तो  तुम परियों के बारे में भी नहीं जानते। हम सभी खिलखिला हँस पड़े थे। पर कहते हैं ना,कि अन्न इंसान को अपनी जगह खींच ही लेता है। वही मेरे साथ भी हुआ।यहाँ बहुत प्रयास के बाद भी मुझें नौकरी नहीं मिल रही थी।पूरे एक साल तक मैं प्रयास करता रहा था। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। और वही हुआ हिमाचल के बागों में एक दोस्त की मदद से मुझें नौकरी मिल गई थी।
मैं सुन्दर पहाड़ियों की ओर खींचा चला आया था।पर मैं अपनी मिट्टी का मोह नहीं छोड़ पा रहा था।पर जब मालिक की बेटी वंदना को देखा देखता ही रह गया था।इतनी सुंदर लड़कियाँ तो सिर्फ फिल्मों में ही होती है,मेरे मुँह से निकल गया था।पर यह कोई फिल्म नहीं थी,वह मेरे सामने थी पूरी खूबसूरती की खान।
और मुझें सबसे ज्यादा आकर्षित करता था, उसके गालों में पड़ने वाला बड़े-बड़े गड्ढे, मैं तो उसे देखता ही रह गया था। मेरे दोस्त ने ही मुझें चेताया था, यह मालिक की बेटी वंदना है। मैंने उसे हाथ जोड़कर नमस्ते कहा।उसने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया।उसका मुस्कराना मुझें आज भी याद हैं।आँख बन्द करके आज भी मैं उसकी मुस्कराहट याद कर सकता हूँ।
लंबे इंतजार के बाद वंदना का दोबारा मैसेज आया। क्या आपने मुझें पहचाना भी नहीं हैं? तुम्हारी पहाड़ी सहेली। मेरा शक सही था। यह मेरी वंदना ही थी।अच्छा मैं आपको रात को मैसेज करूँगी।पर आप मुझें मैसेज मत करना।
मैं एक बार फिर अतीत की यादों में खो गया।आखिरी मुलाकात मेरी आँखों के सामने सहज हो गई।वह पीले सूट में मुझसे मिलने आई थी। रात का अंधेरा बढ़ रहा था। सूरज मध्यम हो रहा था। सूरज की लालिमा भी लाल सेब की तरह चमक रही थी।वह पेड़ के नीचे,मेरी बाहों में बाहें डालकर बैठी थी।वह हमेशा ऐसा ही किया करती थी। मुझमें सिमट जाना चाहती थी। उसका मखमली स्पर्श मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ। उस दिन उसकी आँखे नम थीं। सुनील चलो, भाग चलते हैं। कहीं दूर बहुत दूर जहाँ हम दोनों को कोई जुदा ना कर सके। पर क्या भागना जरूरी है? वह मुझें देखे जा रही थी।
क्या कोई दूसरा रास्ता है तुम्हारे पास? तुम्हारे बिना मैं नहीं रह सकती।अगर तुमने देर की, तो मेरी शादी किसी और से हो जाएगी। बाबा ने लड़का देख लिया है। तुम्हें तो बाबा का स्वभाव पता ही है कि वो कितने सख्त है? वह मेरी बाहों में सिमटती की जा रही थी। मैंने उसे कसकर अपने आगोश में भर लिया था। हम एक-दूसरे में खो गए थे।
उसका घर बाग में ही था,बड़ा सा,खुला हवादार।घर के सामने बहुत ही सुंदर नदी थी।उसकी झर-झर करती लहरें मुझें अपनी ओर खींचती थी।सोच कर बता देना, मेरे सुनील।मैं उसे घर की तरफ जाते देख रहा था।उस दिन मेरा मन बहुत उदास था।
रात का अंधेरा गहरा होता जा रहा था।मैं छत पर तारों की छाँव तले बिस्तर पर करवटें बदल रहा था।उसके फोन का इंतजार, मेरी आँखों को बंद नहीं होने दे रहा था। ठंडी-ठंडी हवा मुझें शीतलता प्रदान कर रही थी।और चाँद तारे आज कुछ ज्यादा ही चमक रहे थे।चाँद की चाँदनी दूध में नहाई, इतनी सुंदर लग रही थीं।मेरा इंतजार लंबा होता जा रहा था।
उसके साथ बिताए दिन मेरी जिंदगी का अनमोल खजाना थे। रात एक बजे फोन पर मैसेज की आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया। मैसेज में एक फोन नंबर लिखा था। मैंने तुरंत फोन किया।कैसे हो,मेरे सुनील? तुम ठीक हो,वंदना। बस जिंदगी काट रही हूँ।वह फोन पर ही सुबक रही थी। क्या हुआ कुछ तो कहो?
उसने खुद को संभाला, मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाई,शायद कभी भूल भी नहीं सकती।चार सालों में कोई ऐसा दिन नहीं था। जब मुझें तुम्हारी याद ना आई हो।तुम्हारे बिना जीना तो कैद सा लगता रहा,पता नहीं तुमने क्या जादू कर दिया है? जब भी घर पर अकेली होती हूँ। तुमसे बातें करती हूँ।जब भी आँखे बंद करती हूँ, तुम्हारा चेहरा मेरी आंखों के सामने होता हैं। हमेशा ऐसा लगता है कि अभी तुम पीछे से आकर मुझें बाहों में भर लोगे। पर ये तो अतीत की यादें ही है।क्या मैं तुमसे रोज बात कर सकती हूँ।और वह चुप हो गई।मैं रो देना चाहता था, पर हिम्मत करके सुनता रहा।और उसने यह कह कर फोन रख दिया। मैं कल रात को बात करूँगी,मेरा इंतजार करना। मैं रात भर सो नहीं सका।मैं खुद को धिक्कार रहा था कि उस रात वंदना की बात मान लेता तो कितना अच्छा होता?
मैं उसे हमेशा के लिए अपना लेता। समाज तो हमेशा ही प्यार करने वालों के खिलाफ होता है।बस हमें समाज के विरोध का सामना करना पड़ता। रात भर वंदना का चेहरा मेरी आँखों के सामने तैरता रहा।मैं सपनोँ में उसके पास पहुंच जाना चाहता था।इसी सोच-विचार में पता नहीं कब मेरी आँख लग गई,पता ही नहीं चला?
नींद की आगोश में, मैं वंदना के पास था। आज भी वह खड़ी-खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसने मुझें अपनी तरफ खींच लिया,मैं उसे अपनी बाहों में लेना चाहता था। तभी माँ की आवाज ने मेरी नींद भंग कर दी।माँ मेरे सामने खड़ी थी। वह मुझें लगातार घूरे जा रही थी। सूरज की तेज रोशनी मेरे पूरे बदन पर छाई थी। सुनील क्या सारा दिन सोता ही रहेगा?माँ, क्या टाइम हो रहा है?बारह बज रहे हैं, दोपहर हो रही है। आज तो तुमनें कमाल कर दिया! पता नहीं आज इतनी देर तक कैसे आँख नहीं खुली? माँ, मेरे पास बैठ गई। क्या बात है, कुछ परेशानी है?नहीं- नहीं माँ,तुम व्यर्थ ही चिंता करती हो।माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरा और चली गई।
वंदना की शादी बड़ी धूमधाम से हुई थी।पूरा घर महल की तरह सजाया गया था। सारा गाँव शादी में आया था। मेरा मन बहुत उदास था,उस दिन।चारों तरफ़ खुशियों का माहौल था।रात भी आज चाँद की चाँदनी में नहाई लग रही थी।नदियों का जल भी शान्त था।सारा गाँव इस शादी में शामिल था। प्रकृति का मनमोहक दृश्य मुझें हमेशा आकर्षित करता था।जोड़े में सजी-धजी वंदना किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। वह अपने कमरे में अपनी सहेलियों के बीच बैठी थी। जैसे कोई राजकुमारी हो। और सभी सहेलियाँ उसकी दासी लग रही थी।
उसने संदेश भेजा था क्या तुम मुझसे मिलने नहीं आओगे, सुनील ? मैं उसे दूर से ही देखता रहा।मुझें खुद पर गुस्सा आ रहा था।काश मैं वंदना की बात मान लेता तो आज वह मेरी बाहों में होती, सदा के लिए।
जब वंदना के फ़ेरे शुरू हुए,तब मैं अपना बैग उठाकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ था, हमेशा-हमेशा के लिए।अब मैं वहाँ कभी नहीं लौटना चाहता था।मेरा कौन था,वहाँ?वंदना  किसी और की हो चुकी थी। वह रात इतनी काली थी, मेरा सब कुछ लूट चुका था।
आज फिर मैं वंदना के फोन का इंतजार कर रहा था। मेरी तड़प लगातार बढ़ रही थी। पर वंदना का कोई मैसेज नहीं आया। आज भी रात बहुत काली थी। मेरा मन बैठा जा रहा था,किसी अप्रिय घटना के भय से। मैसेज भी आ गया था, सुनील मेरी पीड़ा बहुत बढ़ गई है। क्या तुम आज भी मेरा इंतजार कर रहे हो। तुम्हें पता है इस जन्म में हमारा मिलन संभव नहीं है। पर अगले जन्म में हम जरूर मिलेंगे। मेरा इंतजार करना।तुम्हारी वंदना फोन से आवाज आनी बंद हो गई।
मैंने आज तक शादी नहीं की। समय भाग रहा था, दिन महीनों में, महीने सालों में बदल गए थे। मैं आज फिर से हिमाचल जा रहा था।मैं मालिक से मिला, मैंने वंदना के बारे में पूछा?मेरी बेटी नहीं रही, मालिक की आँखों में आँसू थे। वह अपनी शादी से खुश नहीं थी।किसी से प्यार करती थी। उस रात उसने किसी से बात भी की थी। वह मुझें उस स्थान पर ले गए।
नदी की शान्त लहरें बह रही थी। इसी में समा गई थी वंदना। आगे मालिक कुछ नहीं बोल सके। मैं वहीं खड़ा नदी को देखता रहा।मुझें ऐसा लग रहा था, जैसे वंदना कर रही हो, मेरा इंतजार करना,तुम्हारी वंदना।
यही उसका आखिरी मैसेज था। मैं भी उस नदी में समा जाना चाहता था, हमेशा-हमेशा के लिए।पर  मैं लौट आया था।अब मेरे जीवन की आखिरी बेला में, मेरा शरीर,मेरी आत्मा सब मेरा साथ छोड़ रही थी।मैं बार-बार उसी आखिरी मैसेज को पढ़ रहा हूँ।मेरी आँखे बंद हो रही हैं।वंदना मेरा इंतजार कर रही हैं।

परिचय - राकेश कुमार तगाला

1006/13 ए,महावीर कॉलोनी पानीपत-132103 हरियाणा Whatsapp no 7206316638 E-mail: tagala269@gmail.com

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