गीतिका/ग़ज़ल

नज्म

अजीब नादां हो तुम भी नादानियों की हद करते हो,
बेवफाई तक का जिन्हें शऊर नहीं, उनसे वफा की उम्मीद करते हो.
कैरम की गोटियां तो संभाली नहीं जातीं तुमसे,
समय की कीलियों को साधने की जिद्द करते हो.
कितनी खूबसूरती से मुझी को गैर कह दिया,
अपनापन निभाने की बात शिद्दत से करते हो.
ग़मों की आंधियों से लड़ने की सूरत मिले कैसे,
मुस्कुराने तक में सिरे से किफायत करते हो.
खुद पर इनायत करने का कभी ख्याल तक नहीं आया,
खुदा की अकीदत करने को इबादत कहते हो.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

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