लघुकथा

आस (लघुकथा)

शारदा के बेटा होने की खबर स्कूल पहुंची, तो पूरे स्टॉफ का खुश होना लाजिमी था.

”मुझे पता था, कि उसके बेटा ही होगा. शारदा के पति ने चोरी-छिपे उसका भ्रूण-परीक्षण करवा लिया था.” शारदा की एक सहकर्मी ने कहा.

अचंभा सरला को भी हुआ था, जब अचानक उसने देखा कि अब शारदा के पति उसको स्कूटर पर छोड़ने आया करने लगे थे. पानी की बोतल भी थर्मस वाली बन गई थी. सरला की स्मृति में कुछ समय पहले का मंजर ताजा हो गया.

”आप एक काम कर सकती हैं सरला जी! आपका घर तो पास में ही है, मुझे आजकल प्यास बहुत लगती है, मेरे लिए भी पानी की एक बोतल ले आया कीजिए.” दो बेटियों की मां गर्भवती शारदा ने अपनी सहकर्मी अध्यापिका से निहोरा करते हुए कहा था.

”लीजिए, इसमें क्या दिक्कत है? अवश्य लाया करूंगी. आप निश्चिंत रहिए.” सरला जी ने मुस्कुराते हुए कहा था.

”वो क्या है न! कि मुझे घर से स्कूल तक और स्कूल से घर तक इतना बोझ उठाने में दिक्कत होती है.” शारदा ने सकुचाते हुए कहा था.

सरला पांच महीने तक उसके लिए बराबर पानी लाया करती थी. तभी एक दिन शारदा ने कहा था- ”सरला जी, आप इतने समय तक पानी की सेवा करती रहीं, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. कृपया कल से मत लाइएगा.”

बेटे की आस ने मुरझाए चेहरे वाली शारदा को सभी सुविधाएं मुहय्या करवा दी थीं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “आस (लघुकथा)

  1. दुनिया कितनी भी डिजिटल हो जाए, माता-पिता और बुजुर्गों को बेटे की आस लगी ही रहती है. अब स्थिति भले ही कुछ-कुछ बदलने लगी है, लेकिन बेटे की आस मन-ही-मन लगी ही रहती है.

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