लघुकथा

गर्व

आज सोनी के ममी-पापा सात समंदर पार आकर क्वारंटीन खत्म करके उसके घर में आ गए हैं. इसका सारा श्रेय हितेश को ही तो जाता है! सोनी को बरसों पहले हितेश के प्रपोज करने का दृश्य याद आ गया.

”सोनी, बहुत हो गया छिप-छिपकर मिलना अब मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं. ” हितेश ने कहा था.

”ठीक है, मैं तो तुम्हारे ममी-पापा को अपना समझकर पूरा मान-सम्मान दूंगी ही, क्या तुम भी ऐसा कर पाओगे? आखिर अपने ममी-पापा के प्रति मेरा भी कुछ कर्त्तव्य है!”

”यह मेरी सबसे पहली पहल होगी, तुम विश्वास रखो.” हितेश ने कहा था.
शादी के बाद वे विदेश चले गए थे.

”ममी-पापा को भारत से बुलाने में कितनी मुश्किलें आ रही थीं! कोविड का भयंकर समां चल रहा था, पहले विदेशों की उड़ानें बंद थीं फिर सीमित खुलीं, वो भी बहुत महंगी. उसके बाद क्वारंटीन के खर्चे का जवाब नहीं. हितेश ने हिम्मत नहीं हारी. आखिर सब प्रबंध हो गया. शुरु से लेकर क्वारंटीन तक हितेश ममी-पापा की सभी सुविधाओं को स्वतः देखते-सुनिश्चित करते रहे. अब तो ममी-पापा कुशलतापूर्वक घर भी आ चुके हैं, लेकिन हितेश अभी भी काम पर लगा हुआ है. ममी-पापा क्वारंटीन समेत सब खर्चा खुद करना चाहते हैं. हितेश ने विश्वास रखकर ममी-पापा के वार्धक्य और कम आय के युक्तिसंगत तर्क देकर क्वारंटीन का खर्चा आधा करवाने का अथक प्रयास किया.” सोनी की सोच जारी थी.

”उसी विश्वास और अथक प्रयास की जीत हुई थी. आज क्वारंटीन के ढाई हजार डॉलर का ड्राफ्ट आ गया था.”

सोनी को अपनी पसंद और अपने प्यार के विश्वास पर गर्व महसूस हो रहा था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “गर्व

  1. सोनी को अपने प्यार के विश्वास पर गर्व होना स्वाभाविक है, पत्नि के माता-पिता का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए, जितना पति के माता-पिता का. बेटी-बेटा सम्मान हैं.

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