कविता

देह और देह

भोगा हुआ यथार्थ

सिर्फ कैनवास में

उकेरने की चीज है ।

कैनवास

व्यक्तिगत हो सकता है,

किन्तु कागज तो

सार्वजनिक वस्तु है,

रहेगी ।

आरक्षित गाड़ी

कागज का देह

कतई नहीं हो सकती !

परंतु वहीं काव्यकला

एक अवस्था है,

तो चित्रकला

अद्वितीय व्यवस्था ।

दोनों मर्मस्पर्शी,

किन्तु उतने ही

देहस्पर्शी भी ।

तभी तो

दंश का देह

समर्पित मानी गयी,

जो अब भी

मानी जाती रही है ।

फूलों की माँग

उनकी सुंदरता लिए है,

  • तो सुगंध के लिए भी।

डॉ. सदानंद पॉल

एम.ए. (त्रय), नेट उत्तीर्ण (यूजीसी), जे.आर.एफ. (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार), विद्यावाचस्पति (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर), अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी के प्रशंसित पत्र प्राप्तकर्त्ता. गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स इत्यादि में वर्ल्ड/नेशनल 300+ रिकॉर्ड्स दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 12,000+ रचनाएँ और संपादक के नाम पत्र प्रकाशित. गणित पहेली- सदानंदकु सुडोकु, अटकू, KP10, अभाज्य संख्याओं के सटीक सूत्र इत्यादि के अन्वेषक, भारत के सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में अर्हताधारक, पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.