लघुकथा

इरादा

स्निग्धा अपने इरादे के सुपरिणाम से बहुत प्रसन्न थी.

उसके सुदृढ़ इरादे ने ही तो उसको सबल सहारा दिया था न!

न जाने क्यों उसे लग रहा था, कि वह कुछ नहीं कर पाएगी, कुछ नया नहीं सोच पाएगी. उसमें कुछ करने की हिम्मत नहीं है. गुलाबी सुबह भी काली रात लगने लगी थी. वह हर तरह से दूसरों की मोहताज हो गई है!

ऐसे में भी उसे लग रहा था, कि कोई हाथ उसे मदद देने को तत्पर था.

”किसका हाथ हो सकता है यह?” सोचते-सोचते वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी.

हाथ चाहे किसी का भी हो, वह कब तक साथ दे सकेगा?

निराशा का अंधकार और गहन होता जा रहा था.

तभी आसमान में गरज के साथ अचानक बिजली चमकी.

उसी रोशनी में उसे आभास हुआ, कि वह तो उसका अपना ही हाथ था. उस हाथ में मन का साथ था.

”निश्चय ही मुझे अपने मन के गहन अंधकार से मेरा अपना हाथ और साथ ही बाहर निकाल सकता है.”

इसी इरादे ने उसके अंदर साहस का संचार कर दिया था. उसका अपना हाथ ही इरादे के रूप में उसका सबल सहारा बन गया था.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “इरादा

  • लीला तिवानी

    इरादा पक्का हो, तो सफलता को कोई नहीं रोक पाएगा. अपना हाथ, जगन्नाथ. अपना हाथ और सुदृढ़ इरादा ही सबल सहारा हो सकता है. नाम स्निग्धा, लेकिन अपने हाथ हाथ का साथ हो और हो सुदृढ़ इरादा! फिर सफलता दूर कैसे रह पाएगी?

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