लघुकथा

मानव धर्म 

“अल्लाह तेरी झोली भरेगा तू इस झोली को भर “
नितिका यहां बहां की खबरों से बेखबर अपने मोबाइल में व्यस्त थी ….जब नितिका ने कोई ध्यान न दिया तो चिढ से गये वह दो व्यक्ति ।
“दे बेटी ,अल्लाह रहमत करेगा ” ध्यान खींचने के लिये नितिका के सामने चादर फैलाकर खडे हो गये ।
“मुझे रहमत की जरूरत नहीं, आप ही रखिये और आगे बढिये”
” अल्लाह को नाराज नहीं करते बेटी “
” अरे आप आगे जाइये …वैसै भी आपके अल्लाह खुश कहां रहते है …जाइये आप आगे “
चढावा भी आतंक पैदा करके  ले रहे ..आतंकी कौम ..मन ही मन शब्द होठों तक होकर वापस चले गये नितिका के ।
पन्द्रह घंटे का सफर था ,कड़कड़ाती सर्दी थी । स्लीपर कोच में सभी अपने अपने कम्बल निकाल दुबकने की तैयारी करने लगे ।
स्टेशन पर गाडी खडी थी ..नितिका बच्चो को कुछ लेने स्टेशन पर उतर गई।
एक घायल अवस्था में दर्द और ठन्ड से कांपता बेबस भिखारी साइड में पडा था …दर्द आंखो से बह रहा था ,किसी से कुछ कहता तो लतिया दिया जाता इसलिये बहती अश्रुधारा से अपने दर्द को कम कर रहा था ।
नितिका जल्दी से बापस आई एक कम्बल उठाया और पर्स से कुछ दर्द निवारक दवाइयां निकाल उस बेबस को खिला दी …कुछ खाने का सामान और पानी की बोतल रखकर कम्बल उडा दिया । उस बेबस ने दोनो हाथ उठाकर कांपते होठों से नितिका को आशीर्वाद दिया … “अल्लाह तुझ पर रहमत बरसाये”
” जरूर ..” नितिका ने हंसकर जबाब दिया । जब तक ट्रैन ने सिग्नल दे दिया था ।
नितिका का आठ साल का बेटा यह सब देख रहा था ।
“मां एक बात बताओ अभी तो आप अल्लाह के नाम पर मांगने बालो को आतंकी कह रही थी फिर वह भी तो दूसरे धर्म का था जिसकी आपने मदद की “
” क्योंकि बेटा …उनके मांगने में याचक का भाव नहीं था …वे खौफ पैदा कर रहे थे कि उनकी बात न मानी तो अनर्थ हो जायेगा …..
और जिसका हमने दर्द बांटा वह सिर्फ लाचार इन्सान था …मानवता का कोई धर्म नहीं होता ..सर्व मानव का सेवा भाव ही इन्सान का धर्म है “
” लेकिन मां आपने अपना कम्बल तो उसे दे दिया अब आपको ठन्ड लगेगी “
” तो क्या …अब मैं और तुम एक सीट पर एक कम्बल में सो जायेगे”
@रजनी चतुर्वेदी (बिलगैयां)

परिचय - रजनी विलगैयाँ

शिक्षा : पोस्ट ग्रेजुएट कामर्स, गृहणी पति व्यवसायी है, तीन बेटियां एक बेटा, निवास : बीना, जिला सागर

One thought on “मानव धर्म 

  1. और जिसका हमने दर्द बांटा वह सिर्फ लाचार इन्सान था …मानवता का कोई धर्म नहीं होता ..सर्व मानव का सेवा भाव ही इन्सान का धर्म है “
    ” लेकिन मां आपने अपना कम्बल तो उसे दे दिया अब आपको ठन्ड लगेगी “
    वाह! पात्रता को देखकर ही कुछ देना चाहिए। यही समय की मांग है और अपनी सुरक्षा की भी।

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