पर्यावरण

पिता गौरैया और माँ गौरैया के स्वभाव में मूलभूत अन्तरः एक सजग आकलन

हमारे घर में आजकल सैकड़ों गौरैयों के घोसलों में उनके बच्चों की किलकारियां गूँज रहीं हैं। प्रातःकाल सूर्योदय के साथ ही नन्हीं माँ गौरैया अपने बच्चों की परिवरिश करने और सेवा करने में जुट जाती है, यथा उन्हें खाना खिलाना,पानी पिलाना,घोसले की साफ-सफाई करना और उनके मल को अपने चोंच में ले जाकर दूर फेंकना आदि-आदि कार्य पूरी तन्मयता और निष्ठा से करती है। वैसे कभी-कभी देखते हैं, कि गौरैयों के बच्चे घोसले के मुँह के बाहर अपनी पूँछ करके अपने मल को घोसले के बाहर विसर्जित कर देते हैं। माँ गौरैया लगभग लगातार सूर्योदय से सूर्यास्त तक अपने बच्चों को खाना खिलाती रहती है,अँडों से निकलने के बाद दस या बारह दिनों में ही गौरैयों के बच्चे उड़ने की स्थिति में आकर अक्सर अपना घोसला छोड़ देते हैं,क्योंकि प्रकृति ने इस नन्हीं चिड़िया के बच्चों के बहुत से दुश्मनों, यथा बाज, बिल्ली, साँप, नेवला, चूहा, छुछुंदर, गिलहरी आदि-आदि दुश्मनों की सूची बहुत ही लम्बी है, से बचाव के लिए इनके तीव्र शारीरिक विकास करने का तरीका अपनाया है, इसलिए प्रकृति ने इसके नन्हें बच्चों की भूख को अत्यधिक बढ़ाकर, इनको दुश्मनों से बचने के लिए इनके तीव्र शारीरिक वृद्धि करने का रास्ता बनाया है ! मैंने खूब ध्यानपूर्वक देखा है, कि बच्चों की परिवरिश और लालनपालन में माँ गौरैया की भूमिका 90 प्रतिशत तक होती है ! नर गौरैया केवल घोंसले के पास बैठकर अपनी पत्नी और अपने बच्चों को इनके भयंकरतम् दुश्मनों यथा बाज, बिल्ली, कौआ या साँप वगैरह के आशंकित हमले के प्रति पूरे परिवार को ठीक समय पर जोर से चीखने जैसी आवाज़ निकाल कर सुरक्षित और सावधान होने का काम यानि सजग और चैतन्य चौकीदारी करने का काम करता है, वैसे देखा जाय तो नर गौरैया का यह काम भी बहुत महत्वपूर्ण है, परन्तु मानव समाज की भाँति घर का सारा काम माँ गौरैया के कँधों पर ही रहता है। अपवाद स्वरूप कभी-कभी नर गौरैया अपने बच्चों को खिलाता है, लेकिन कभी-कभार अपवाद स्वरूप माँ गौरैया के मृत्यु हो जाने पर पिता गौरैया बच्चों को खिलाने, पिलाने और अन्य सभी काम करने की जिम्मेदारी बखूबी संभाल लेता है।

— निर्मल कुमार शर्मा