बोधकथा

कहानी : तीन बातें             

हजारों वर्ष पहले की बात है। सिवनीगढ़ में राजा मनोरम देव का राज्य था। अपने पिता महाराज आदित्य देव से प्राप्त राजसिंहासन में बैठे उन्हें बीस बरस बीत चुके थे। उन्होंने अपने पिता का राज्य संचालन अपनी आँखों से देखा था। शांत, सुख-समृद्ध व वैभवपूर्ण राज्य था सिवनीगढ़; पर अब पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि राज्य का वैभव धुमिल होने लगा। प्रसिद्धि मिट्टी में मिलने लगी। सिवनीगढ़ में कई तरह के संकट छाने लगे थे। महाराज मनोरम देव को भी धीरे-धीरे राज्य की दशा अवगत होने लगी। वे बड़े दुखी व चिंतित थे।
एक दिन महाराज मनोरम देव राज्य भ्रमण के लिए निकले; साथ में महारानी प्रभादेवी भी थी। आगे-आगे राजा का रथ और पीछे-पीछे सैनिक। रथ राजसीमा से बहुत दूर निकल गया; और उमरादाह वन जा पहुँचा। वनप्रदेश का सौन्दर्य देखते ही बनता था। हरे-भरे वृक्ष, लताएँ व फूलों के सुगंध से सभी सराबोर हो रहे थे। विचरण करते पशुवृंद व डाल-डाल पर चहकते खगदल वनप्रांत की सुंदरता में चार-चाँद लगा रहे थे। तभी वे ताँदुला नदी के तट पर जा पहुँचे। नदीतट के कुछ दूरी पर उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया। वह महर्षि काव्य का आश्रम था। राजा ने सैनिकों को आश्रम के समीप ठहरने का आदेश दिया; और अपने एक सैनिक के जरिए महर्षि काव्य के पास आश्रमस्थल में अपनी उपस्थिति की सूचना भिजवाई। तत्पश्चात काव्य ऋषि के शिष्यों ने राजा को आदरपूर्वक आश्रम के अंदर ले आये। महाराज मनोरम देव ने महर्षि काव्य को दंडवत प्रणाम किया। आश्रम में राजा का खूब आदर-सत्कार हुआ। महर्षि ने राजा से उनके राज्य का हालचाल पूछा। राजा ने भी आश्रम की यथोचित जानकारी ली। फिर महाराज मनोरम देव ने अपने मन की बात रखी- “हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरे सिवनीगढ़ का राजपाठ वैसे तो ठीक ही है, फिर भी संतोषप्रद नहीं है। सिवनीगढ़ पर संकट का बादल मँडरा रहा है। राज्य में विद्वान रत्न का अभाव होता जा रहा है। अर्थव्यवस्था चरमरा सी गयी है। आज सीमा भी असुरक्षित है। मैंने राज्य के सुचारू संचालन के लिए अपने मत्रियों से मंत्रणा भी ली, पर सब प्रभावहीन मालूम पड़ते हैं। सिवनीगढ़ में अधर्म, अज्ञानता, अशिक्षा, आर्थिक विपन्नता, अराजकता व कई मानवीय अपराध दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। इन सबका कारण मेरी समझ से परे हैं। अतएव मैं आपसे इन सबका कारण व निदान के उपाय की जिज्ञासा रखता हूँ ऋषिवर। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।”
महर्षि काव्य ने महाराज मनोरम देव की पूरी बातें बड़े ध्यान से सुनी। क्षण भर के लिए मौन रहे। फिर राजा के भूत, वर्तमान व भविष्य को ध्यान रखते हुए मधुरतापुर्वक बोले- “हे नरेश! आपने अपने पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलते हुए अपनी राजसेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी; तल्लीनता के साथ अपना राजधर्म निभाया। परंतु विगत कुछ वर्षों से राज्य पर विपत्तियों का धुँध छा रहा है; पर कोई बात, चिंता न करें महाराज। आपका भविष्य उज्जवल है। फिर भी कुशल राज्य संचालन हेतु आपको मेरी तीन बातों का स्मरण रखना होगा।”
“कहिए ऋषिवर, क्या हैं वे तीन बातें?” राजा ने शीश झुकाते हुए कहा।
महर्षि काव्य बोले- “हर मनुष्य का एक गुरू होना अत्यंत आवश्यक है। गुरू के बगैर ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। ज्ञान के बिना जीवन निरथर्क होता है; और आप तो एक राजा हैं। आपका भी एक गुरू, अर्थात राजगुरु होना अत्यावश्यक है। एक राजगुरू के मार्गदर्शन से ही आपका सुचारु सत्ता संचालन सम्भव है। एक गुरू ही राजा को धर्म व ज्ञान-विज्ञान का पथ प्रदर्शन करता है। गुरू ही राजा को उनके चाटुकार परिजन व मंत्रीगण से बचाता है।” राजा और रानी दोनों महर्षि की बातें ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। फिर राजा बोले- “पर मुझे कभी अपने राजगुरू के मार्गदर्शन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी ऋषिवर।” महर्षि मुस्कुराये- “राजन! एक राजगुरू के यथोचित सलाह से ही राजपाठ चलता है। आपने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। महाराज, अपने गुरू का सम्मान करें। उनके ज्ञान व अनुभव का लाभ उठावें। इससे आपको अपना राजपाठ चलाने में सहयोग मिलेगा।”
“जी ऋषिश्रेष्ठ! मुझे आपका सलाह भरा आशीष स्वीकार है।” राजा नतमस्तक हुआ।…और दूसरी बात प्रभो! सविस्तार बताकर कृपया मेरा मार्ग प्रशस्त करें।”
“मेरी अगली बात एक भूमिपुत्र से सम्बंधित है राजेश्वर।” महर्षि काव्य ने अपनी दूसरी बात रखने लगा।
“भूमिपुत्र…अर्थात?” राजा ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।
“अर्थात… किसान… खेतिहर से है राजन!” महर्षि ने दूसरी बात रखते हुए कहा- “हे नरेश! आपके राज्य में किसान प्रसन्न नहीं हैं। वे सामंतवर्ग के जाल में उलझे हुए हैं। उन्हें सामंतवाद से मुक्त करें। उनकी स्थिति दयनीय है। किसानों को उनकी भूमि दिलवायें, और उन्हें ही मेहनत करने देवें; अन्न उपजाने देवें। अन्नोपज की कला खेतिहर में ही होती है। उसके उगाए हुए अन्न से संसार की भूख मिटती है। अतः आप कृषकवर्ग का सम्मान करें। उनकी सुनें और उन्हें यथोचित अपनी सहभागिता प्रदान करें।”
” सहभागिता से क्या आशय है भगवन?” राजा ने प्रश्न किया।
“हे प्रजापालक! सहभागिता का तात्पर्य है- एक किसान को बीज, खाद और आवश्यकतानुसार उसे राशि जुटाकर सहयोग करें। प्राकृतिक आपातकाल में किसानों को लगान मुक्त कर देवें। उनके श्रम का सम्मान करें। ध्यान रहे राजन, किसान की भूख की आह पूरे देश को लगती है।”
“हे ऋषिश्रेष्ठ! आपकी यह बात भी मुझे समझ आ गयी।” राजा ने विनम्रतापूर्वक कहा- “हे महात्मन्! कृपया अब आप अपनी तीसरी बात कहिए जो मेरे राजहित में हो।”
” राजन! मेरी तीसरी, और अंतिम बात भी बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति से सम्बंधित है।” महर्षि काव्य बोले-” और वह है- एक सैनिक।”
“सैनिक!” राजा का हतप्रभ स्वर निकला।
“हे महीप! सैनिक चाहे राजप्रहरी हो; चाहे सीमा पर डटे कर्तव्यनिष्ठ सिपाही हों; राजा को सदैव उनके कर्तव्यों के प्रति सजग रहना चाहिए; उन्हें प्रोत्साहित करते रहना चाहिए।। इससे सैनिक को एक नई ऊर्जा मिलती है। एक सैनिक के प्रति राजा की उदासीनता उसे पथभ्रष्ट बना देता है; और एक पथभ्रष्ट सैनिक कर्तव्यविमुख होता है। फिर उसमें देशभक्ति नहीं रह जाती। इसका लाभ सीमा पार राजाओं को मिलता है राजन।” महर्षि आगे कुछ और कह ही रहे थे कि राजा बोले- “हे ज्ञानर्षि! मेरा इस ओर कभी ध्यान नहीं रहा।”
“हाँ राजन, यह आपकी भूल है। एक राजा को सैनिकों के शारीरिक व मानसिक दशा से अवगत होते रहना चाहिए। उनके परिजनों का भी ध्यान रखना चाहिए। एक सैनिक की वीरता, समर्पण, ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा से समूचे राज्य में शांति बनी रहती है।” महर्षि काव्य क्षण भर रूक कर बोले- “हे सिवनेश्वर! मेरी इन तीन बातों का सदैव ध्यान रखें। आपके राज्य में सदैव शांति व सुख-समृद्धि बनी रहेगी। आपका राज्य दिगर राज्यों से भयमुक्त रहेगा। प्रजा सदैव सुखी होगी। उसमें संतोष व्याप्त होगा। आपका राज्य सदैव फलता-फूलता रहेगा।” फिर महर्षि ने अपनी वाणी को विराम दिया।
“आज मैं धन्य हुआ भगवन! आपकी तीन रहस्यपूर्ण गूढ़ बातों ने मेरी आँखें खोल दी।” कहते हुए महाराज मनोरम देव ने महर्षि काव्य को श्रद्धावनत् चरण स्पर्श किया; और रानी प्रभादेवी के साथ दलबल सहित सिवनीगढ़ के लिए आश्रम से विदा ली।

@ टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”