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कवि का धर्म

 

कवि होना सहज नहीं।
कवि होने के लिए धरती सा धीरज चाहिए।
समेट लेता है कवि सारे भावों को सीप में छुपे मोती की तरह।
समुंद मंथन कर दुनियां को देता है अनमोल काव्य रत्न।
समाज में व्यापत विष को भी उजागर करता है और प्रेम रूपी अमृत को दुनियां से मिलाता है।
बसंत के झूलों के आनंद का मौल बता कर व्रक्षो से प्रेम करना सिखाता है।
धरती से ले अंबर के चाँद तारों की सैर कराता है।
सूरज की लाली और गरिमा का महत्व बतलाता है।
कवि ऐसा जो दुनियां को प्रेम के सागर में गोते कराये और देश के लिए बलिदान दे शौर्य गाथा बतलाता है।

कवि का सच्चा धर्म कविता करना ही नहीं अपितु नई पीढ़ी के लिए पुरानी पीढ़ी की धरोहर पेश करना है।
देश ,धर्म की और संस्कृति का प्रचार और प्रसार करना भी है।।

संध्या चतुर्वेदी
मथुरा, उप

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