गीत/नवगीत

मजदूर हूँ

हाँ मैं मजदूर श्रमिक किसान ।।
मेहनत पर मजदूरी मिले
नहीं मिलती वह भी भरपेट,
रचि – रचि के है काम कराता
फिर भी पैसा न देता सेठ,
करूँ कितना भी ढंग से काम
पर खरा उतरता न साहबान ।
हाँ मैं मजदूर श्रमिक किसान ।।
बिन मेरे इस जहान का
असम्भव होता हर काम,
कहलाता विश्वकर्मा जग का
सबका घर बनाता आलीशान,
सोता फुटपाथ गगन ओढ़कर
बना न पाता खुद का ठिकान
हाँ मैं मजदूर श्रमिक किसान ।।
सदा चलता हैं कर्म पथ पर
पड़े सर्दी गरमी या धूप,
कार्य तलब सदा बनी रहती
चाहे लगी हो कितनी भूख,
बीबी बच्चे सब चिन्तित रहते
क्या खायेंगे अगले बिहान ।
हाँ मैं मजदूर श्रमिक किसान ।।
काम की तलाश में हम हैं
भटकते शहर- शहर और गाँव,
कभी मिलता,कभी ना मिलता
ढूँढ़ते दर -दर फट जाते पाँव,
सिर पर गठरी कथरी लादे
ढोते रहते यहाँ – वहाँ सामान ।
हाँ मैं मजदूर श्रमिक किसान ।।
— जय हिन्द सिंह ‘हिन्द’ 

जय हिन्द सिंह 'हिन्द'

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