ब्लॉग/परिचर्चा

कोविड महामारी में सामाजिक मूल्यों का पतन

कोरोना वायरस चीन के वुहान शहर में उत्पन्न हुआ और देखते देखते पूरे विश्व में एक माहामारी बनकर फैल गया ,विश्व का कोई भी देश इस महामारी से अछूता न रहा ,लाखों लोग असमय काल-कवलित हो गये ।पहली लहर बीती ,विश्व के कई देश दूसरी लहर से जूझ रहे हैं ,तो कई देश तीसरी लहर से ।
इस माहामारी में विश्व समुदाय में कई सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, । इस महामारी ने समाज में एक भय व्याप्त कर दिया ,मृत्यु का भय, और फिर कुछ उदासीन संतों और रणबांकुरो के अलावा सबको मृत्यु भयभीत करती है ,इस भय ने सामाजिक मूल्यों का पतन किया है , हाँ यह अलग बात है कि कुछ समाजसेवियों/स्वयंसेवकों ने इस भय के माहौल में भी रोगियों, उनके परिजनों की सहायता की है और निरंतर कार्यरत हैं।
संसार का एक प्राकृतिक स्वभाव है अवसरवाद ,तो इस महामारी में भी बहुत सारे अवसरवादियों ने निजी स्वार्थों के कारण सामाजिक मूल्यों की अनदेखी की है ।अवधी की एक कहावत है ‘हल्दी का भाव ? -जेतना चोट पिराय ‘ अवसरवादियों ने इसको मूलमंत्र मानकर लोगों की पीड़ा का रोजगार शुरू कर दिया है ।
बहुत सारे झोलाछाप/निजी चिकित्सा संस्थान लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए ,मनमाने बिल थमा रहे हैं,एंबुलेंस वालों ने भी अपने दाम बढ़ा दिये है । दवाओं और आक्सीजन और अन्य आवश्यक उपकरणों की जमाखोरी और कालाबाजारी चल रही है । आवश्यक वस्तुएं वास्तविक मूल्य से कई गुना ज्यादा पर बेची जा रही हैं। कई लोग रेमडेसीवीर की शीशी में नकली दवाएँ बेचते हुए पकड़े गये हैं और कई लोग इसकी जमाखोरी करते हुए।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों को भर्ती कराने के नाम पर कई लोग मरीजों के परिजनों से पैसे ऐंठते पकड़े गये हैं ।
बात यहीं नही समाप्त होती जब कोई मरीज मर जाता है तो पार्थिव शरीर की पैकिंग से लेकर अंतिम संस्कार तक धन उगाही की जा रही है ।
आदमीं कितना गिर सकता है ,यह इसी बात से सोचिए , एक दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिला कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपराधियों का एक समूह लाशों के अंतिम वस्त्र (कफन, चादर आदि ) चुरा के बाजारों में बेच रहा है ।
उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर गंगा नदी में सैकड़ो लावारिस लाशें उतराती मिलीं ,आखिर उन लाशों को किसी ने फेंका ही तो होगा? अपनों नें या किन्ही ऐसे जिम्मेदारों ने जिन्हे उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी मिली होगी । यह सामाजिक मूल्यों के पतन का एक वीभत्स उदाहरण है।
लोग अपने परिजनों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती करा के भाग जा रहे हैं, लाशों को लेने नही आ रहें हैं ।न जाने कितनी लाशें मोर्चरी/डीप फ्रीजर्स में परिजनों की प्रतीक्षा में रखी हुई हैं ।कुछ मरीजों की मृत्यु के बाद उनके घर वाले फोन तक नही उठा रहे हैं ,ऐसे में उन लाशों का अंतिम संस्कार अस्पताल प्रशासन या स्वयंसेवी संस्थाएँ कर रही हैं ।इस कोरोना महामारी के भय ने आपसी रिश्तों के महत्व को समाप्त कर दिया है ,जिन माँ बाप को मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी संतानों/परिजनों की है,उन्हे अनाथों की तरह अंतिम विदाई मिल रही है ।
जहाँ किसी व्यक्ति के बीमार होने पर परिजन, पड़ोसी मदद के लिए इकट्ठा हो जाते थे ,इस कोरोनाकाल में रोगियों से अपने सगे तक दूरियाँ बना ले रहे हैं ।
शादी विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों में भी लोग शामिल होने से डर रहे हैं, कई शादी विवाह जैसे मांगलिक कार्य पिछले साल से लेकर अब तक कई बार टाले जाने के बाद अब बहुत हल्के फुल्के में चंद संगे संबंधियों की आंशिक उपस्थिति में संपन्न हो रहे हैं ।
लोगों में एक परिवर्तन और देखने को मिला है ,एलोपैथी के साथ साथ लोगों ने परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों जैसे आयुर्वेद, होम्योपैथ का भी विश्वास के साथ सहारा लिया है और काफी हद तक यह लोगों के लाभदायक भी रहा है ।
महामारी के भय और स्वार्थरती लोगों के बीच भी कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ अब भी मरते हुए मानव मूल्यों में प्राण फूँकने में लगी हुई हैं ,कुछ जीवट लोग बिना किसी स्वार्थ के अपना प्लाज्मा दान कर रहे हैं ,कई सारे चिकित्सक अपने काम के अलावा लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं और उनका निदान कर रहे हैं ।
कुल मिलाकर इस महामारी में बहुत सारे लोगों ने सामाजिक और नैतिक मूल्यों को तारतार करके रख दिया है , जो लोग स्वार्थ में अंधे होकर इस आपदा को अवसर समझ बैठे हैं, उन्हे भी कोरोना हो सकता है,उन पर भी कोई विपत्ति आ सकती है, वह भी एक दिन मरेंगे ,इसलिए उतना ही खाइये कि अगला भूखा न सोये और आपको बदहजमी न हो ।

——डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी ,बहराइच (उ.प्र.)

Leave a Reply