सामाजिक

आयुर्वेद बनाम एलोपैथ

भारत में हजारों वर्ष पूर्व से योग और आयुर्वेद जैसी चिकित्सा पद्धति विद्यमान है। अंग्रेजों के भारत में आने से पूर्व यहां की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था उत्तम थी। गांव-गांव गुरुकुल चलते थे। गुरुकुल में योग और आयुर्वेद के साथ-साथ अन्य विषयों की शिक्षा निशुल्क दी जाती थी। अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को नष्ट करने का काम किया। वह इसमें सफल भी रहे। लेकिन भारत की जनता को वह अपनी संस्कृति और संस्कारों से पूर्णतया काट नहीं सके। दुर्भाग्य से भारत जब आजाद हुआ तो देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में गई जो विदेशी संस्कृति में पले बढ़े थे। उन्हें भारत की गौरवशाली परंपरा का ज्ञान नहीं था। इसलिए उन्होंने भारत को पश्चिमी राष्ट्रों की तरह विकसित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने भारत के ज्ञान विज्ञान,योग और आयुर्वेद की उपेक्षा की। इसका दंश आज भी भारत झेल रहा है।  भारत सरकार ने केवल एलोपैथ को बढ़ावा दिया और अन्य चिकित्सा पद्धतियों की ओर ध्यान नहीं दिया।  जिसका परिणाम यह हुआ कि देश आज केवल मात्र एक चिकित्सा पद्धति एलोपैथ पर निर्भर होकर रह गया है। वहीं बाबा रामदेव जैसे देश के संत महात्माओं ने अपनी मेहनत और परिश्रम से योग और आयुर्वेद के माध्यम से लोगों को आरोग्य प्रदान कर रहे हैं। फार्मा कंपनियों को यह यह रास नहीं आ रहा है। अभी हाल ही में बाबा रामदेव के एक बयान का हवाला लेकर उन पर निशाना साधा जा रहा है। सत्य कड़वा होता है। बाबा ने सत्य बात कही है। इसलिए लोगों को अखर रही है। जब अस्पतालों में कौरोना के मरीज बढ़े तो अचानक रेमडीसीवर इंजेक्शन की मांग बढ़ गयी। बाद में स्टेरायड फिर मरीजों को प्लाज्मा चढ़ाया गया। एलोपैथ चिकित्सकों ने ऐसा माहौल बनाया मानो कोरोना में यह अमृत है। बाद में डॉक्टरों ने कहा कि कोरोना के इलाज में यह कारगर नहीं है। इतनी समृद्ध चिकित्सा पद्धति के डॉक्टरों की देखरेख में इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई। फार्मा कंपनियों ने इस आपदा को अवसर के रूप में लिया और खूब कालाबाजारी की। बाबा रामदेव ने जब कोरोनिल बाजार में उतारी तो खूब विरोध हुआ लेकिन हजारों लोग कोरोनिल खाकर ठीक हुए। रही बात समय की तो यह समय उस बयान के अनुकूल नहीं था क्योंकि संकटकाल में शब्दों के चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। बाबा रामदेव के बयान पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन हो हल्ला मचा रहा है। जबकि बाबा रामदेव जी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का नाम ही नहीं लिया था। वहीं एलोपैथिक के सभी चिकित्सकों का प्रतिनिधित्व भी आई एम ए यानी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन नहीं करती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश है। क्योंकि विदेशी फार्मा कंपनियों को बाबा रामदेव के पतंजलि उत्पादों से डर लग रहा है। विदेशी कंपनियों को यह डर सता रहा है की यदि भारत की जनता आयुर्वेद की तरफ उन्मुख हुई तो हमारा सारा कारोबार चौपट हो जाएगा। इसलिए सारी दवा कंपनियां बाबा रामदेव के पीछे पड़ी हैं। आई एम ए बाबा रामदेव से डिग्री मांगता है। आखिर आई एम ए बाबा रामदेव से डिग्री और आयुर्वेद की दवाओं के परीक्षण के बारे में सवाल पूछने वाला होता कौन है?  आयुर्वेद और एलोपैथ में समानता हो ही नहीं सकती। दोनों का अपना अलग-अलग महत्व है। वहीं आयुर्वेद का मतलब केवल बाबा रामदेव से नहीं है और एलोपैथ का मतलब केवल इंडियन मेडिकल एसोसिएशन मात्र से नहीं है। सभी एलोपैथिक चिकित्सक आईएमए के सदस्य भी नहीं है।

वैसे यह समय एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है। यह समय देश को कोरोना से निजात दिलाने का है। यह लड़ाई
 आयुर्वेद बनाम एलोपैथी ही नहीं है। जिन्हें भारत की सभ्यता संस्कृति, संत परंपरा और भगवा से चिढ़ है वह बाबा रामदेव का विरोध कर रहे हैं। बाबा रामदेव का विरोध सनातन संस्कृति का विरोध है। एलोपैथ के अधिकांश चिकित्सकों का आचरण और व्यवहार समझ से परे है। फार्मा कंपनियां 5 की दवा 50 में बेंचती हैं। आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा। सरकार भी एलोपैथ पर ही मेहरबान रहती‌ है लेकिन मोदी सरकार ने आयुष मंत्रालय का गठन कर अन्य चिकित्सा पद्धतियों को सहूलियत प्रदान की है।
यही नहीं आयुर्वेद तो एलोपैथ ही नहीं अपितु विश्व की समस्त चिकित्सा पद्धति की जननी है। सुश्रुत विश्व के पहले शल्य चिकित्सक थे। यह बात एलोपैथ के चिकित्सक भी मानते हैं। फिर भी अभी हाल में जब भारत सरकार ने आयुर्वेद के चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति दी तब भी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन जैसी संस्थाओं ने भारत सरकार का जबरदस्त विरोध किया। आखिर आयुर्वेद का विरोध एलोपैथी क्यों करता है।  योग और आयुर्वेद पर भारत भारत के ऋषि मुनियों ने बहुत शोध किया है। वर्तमान में उसे संरक्षण की जरूरत है। यह काम बाबा रामदेव जी जैसे संत कर रहे हैं। बाबा रामदेव बीपी, शुगर, पोस्टेट कैंसर, अस्थमा,अर्थराइटिस और हेपिटाइटिस का गारंटी से इलाज करते हैं। बाबा 100 से ज्यादा जड़ी बूटियों पर काम कर चुके हैं। उन्होंने देश विदेश के करोड़ों लोगों को योग के माध्यम से निरोग बनाया है। स्वामी रामदेव संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर उपकार एवं उपचार की भावना से काम करते हैं। जबकि फार्मा कंपनियां भारत को बाजार मानकर काम करती हैं।
योगी, ऋषि महर्षि  और संतगण हिमालय पर केवल तप तपस्या के लिए ही नहीं बल्कि शोध और अनुसंधान के लिए जाते थे। योग और आयुर्वेद के सहारे व्यक्ति 100 वर्ष तक स्वस्थ रहने के अलावा परकाया प्रवेश और इच्छा मृत्यु भी प्राप्त कर सकता है। एलोपैथ जहां रोग का निदान करती है वही आयुर्वेद रोग का निदान करने के साथ ही रोग क्यों हुआ इसका भी समाधान करती है।
जिन्हें भारत की कीर्ति नहीं सुहाती वह बाबा रामदेव जैसे योगियों से डरते हैं। योग और आयुर्वेद भारत की समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा का हिस्सा है। पराधीनता के कालखंड में यह अपेक्षित रहा। विदेशी आक्रांताओं ने योग को ना तो विज्ञान माना और ना ही स्वस्थ रहने का बेहतरीन तरीका। फिर भी भारत के मठ मंदिरो में योग और आयुर्वेद प्रचलन में रहा। बाबा रामदेव ने योग को मठ मंदिरों और गिरी कंदराओं से निकालकर जन जन तक पहुंचाने का काम किया। बाबा रामदेव क्रांतिकारी सन्यासी हैं। चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों में देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने का काम किया। वहीं बाबा रामदेव देश को आर्थिक और सांस्कृतिक आजादी दिलाने का कार्य कर रहे हैं। पतंजलि ने देश में स्वदेशी का विकल्प प्रस्तुत किया है यही कारण है कि आज दुनिया भर की फार्मा कंपनियां बाबा रामदेव से परेशान हैं। योग से बड़ी संख्या में लोग घुटने में दर्द, कंधे में दर्द, स्पांडिलाइसिस, साइटिका, हृदय की समस्याएं, उच्च रक्तचाप और पैरों में संचार संबंधी समस्याएं, अस्थमा और  ब्रोंकाइटिस , सिर दर्द और माइग्रेन जैसे तमाम विकार ठीक हो रहे हैं। पतंजलि योगपीठ ने स्वदेशी के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। यदि पूरे विश्व में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर योग के महत्व को मान्यता दी तो उसका श्रेय बाबा रामदेव को जाता है। आयुर्वेद भारत की बहु मूल्य धरोहर है।आज योग और आयुर्वेद संपूर्ण विश्व में मान्यता मिल रही है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि आयुर्वेद का अधिक से अधिक प्रचार प्रसार किया जाए और यह कार्य बाबा रामदेव बखूबी निभा रहे हैं। आज भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को निशाना बनाया जा रहा है तो इस प्रकरण पर  पूरे देश की एक आवाज होनी चाहिए। बाबा रामदेव का विरोध सनातन संस्कृति का विरोध है।  जिसने त्याग पूर्वक सेवामय जीवन जीते हुए देश भर में योग आयुर्वेद और स्वदेशी की अलख जगाई ऐसे संन्यासी का अपमान नहीं होना चाहिए। वैसे बाबा रामदेव समर्थ सन्यासी हैं। वह बंदर घुड़की से डरने वाले भी नहीं हैं। बाबा के साथ बहुत बड़ा समाज खड़ा है।
— बृजनन्दन राजू

बृज नन्दन यादव

संवाददाता, हिंदुस्थान समाचार