इतिहास

प्राचीनकालीन सिक्कों का इतिहास

■ भारतवर्ष के सबसे प्राचीन सिक्के- “आहत सिक्के” ■

मुद्रा के रूप में भारत मे सिक्कों का चलन लगभग ढाई हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। शुरुआत में सिक्कों को आज के सिक्कों की भांति सांचों में ढाला नही जाता था बल्कि धातु के टुकड़ों पर औजारों से प्रहार कर आकृतियां बनाई जाती थीं। इस तरह के सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क कॉइन) कहलाए। 500 ई.पू से 200 ई.पू में आहत सिक्के तत्कालीन जनजीवन में विनिमय के मुख्य स्रोत थे। प्रारंभ में चांदी के आहत सिक्के सर्वाधिक प्राप्त हुए हैं, बाद में तांबे और कांसे के आहत सिक्के भी मिलते हैं। इन सिक्कों का कोई नियमित आकार नहीं होता था, ये राजाओं द्वारा जारी किए जाते थे।

■आहत सिक्कों का शिल्प –
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आहत सिक्के धातु के टुकड़ों पर चिन्ह विशेष या ठप्पा मारकर या पीटकर बनाए जाते थे। आहत सिक्कों को धातु की अधिकर्णी पर हथौड़े से पीटा जाता था। बाद में कतरनी से उसके टुकड़े बनाए जाते थे और अंत में इन टुकड़ों पर बिंब टांक लगाई जाती थी। निर्माण की इस आहत (चोट) करने की पद्धति के आधार पर मुद्राविदों ने इन सिक्कों को आहत सिक्के नाम दिया। आहत सिक्कों पर प्राप्त आकृतियों में मछली, पेड़, मोर, यज्ञ वेदी, हाथी ,शंख, बैल, ज्यामितीय चित्र जैसे- वृत्त, चतुर्भुज, त्रिकोण तथा खरगोश आदि जंतु मिलते हैं। आहत सिक्कों की विशेषता यह थी कि इन पर लेख न होकर मात्र प्रतीक टंके होते थे। प्रारंभ में सिक्के केवल एक ओर ही टंके होते थे, बाद में सिक्कों पर दोनों ओर चिन्हों को अंकित किया जाने लगा था। ये प्राचीन कालीन आहत सिक्के बड़ी संख्या में देश के सभी भागों से मिलते हैं। अधिकांश आहत सिक्के उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तथा बिहार के मगध से मिले हैं। आहत सिक्कों से ही व्यापार में सुदृढ और नवीन संवर्गो के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ था।