कविता

वृक्ष भरपूर लगाना है

जीवन सुखमय बनाना है
धरा पर स्वर्ग जो लाना है
प्राण वायु का स्तर बढ़ाना है
तो वृक्ष भरपूर लगाना है

नदियों के जल को कर प्रदूषित
हम गड्ढा स्वयं ही खोद रहे
अपनी कमियों को देखें न कभी
सब दोष प्रकृति पर ही मढ रहे

ज्यादा आराम के चक्कर में
सुख सुविधाओं के लालच में
प्रकृति का होता दोहन भी अधिक
पर्यावरण भी होता असंतुलित

पशु पक्षी और जीव जन्तुओं की
हजारों प्रजातियां लुप्त हुई
हम भौतिकता की ओर बढे
प्रकृति मां हमसे रूठ गयी

अब भी यदि हम नहि चेते तो
आपदाएं आ सकती हैं और बड़ी
आओ आत्मनिरीक्षण सभी करें
वक्त की है यह मांग बड़ी

— नवल अग्रवाल