इतिहास

स्वाधीनता के महानायक महाराणा प्रताप

वीरता , दिलेरी व देशभक्ति के लिए जो लोग इतिहास में प्रसिद्ध हैं, उनमें महाराणा प्रताप का नाम सबसे ऊपर है।उनका महान व्यक्तित्व सौन्दर्य,तेजस्विता,लौह शरीर को देखकर उन्हें अवतारी या युगपुरुष कहने में कोई अतियुक्ति नहीँ होगी।महाराणा प्रताप ने 25 वर्षों तक अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करने के लिए मुगलों से संघर्ष करके हिन्दुओ के लिये प्रातः स्मरणीय बन गये। उनकी गौरवगाथा आज तक हमारे लिए प्रेरणादायी और प्रासंगिक है।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया विक्रम संवत 1597) को कुंभलगढ़ में राणा उदयसिंह की सोनगरी रानी जयवंता बाई के गर्भ से हुआ। कुम्भलगढ़ में ही प्रताप का बचपन बीता।उन्हें राजपूत राजकुमारों को दी जाने वाली सारी शिक्षा-दीक्षा दी गयी।युवा होते होते वे घुड़सवारी और अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में निपुण हो गए।उन्होंने सैन्य संचालन,सैन्य विन्यास तथा व्यूह रचना में पूर्ण दक्षता प्राप्त कर ली थी।रानियों में सौतियाडाह चलते रहने से प्रताप को उपेक्षित रहना पड़ा।उदय सिंह के शासनकाल में प्रताप ने बागड़िया चौहानो को सोम नदी के किनारे युद्ध में पराजित किया।इस विजय के फलस्वरूप बागड़ का बहुत सा हिस्सा मेवाड़ के अधीन हो गया।
राणा उदय सिंह ने अपने मृत्यु के कुछ दिनों पहले अपनी चहेती रानी धीरबाई भटीयाणी के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।28 फरवरी 1572 में राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गयी। जगमाल के सिंहासन पर बैठने से मेवाड़ी सरदार असन्तुष्ट हो गये तथा 1 मार्च 1572 को होली के दिन गोगुन्दा में प्रताप को मेवाड़ का अधिपति बना दिया गया। असन्तुष्ट जगमाल ने अकबर के यहाँ शरण ली । उसे जहाजपुर का परगना मिला। 1583 में जगमाल दत्तानी के युद्ध में काम आया। भाई शक्ति सिंह भी झगड़े के कारण घर से चला गया था।
राजपूताने के अधिकतर राजपूत शासको ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।किन्तु कई वीरो ने मुगलो की गुलामी न करके युद्ध कर रहे थे। उस समय मारवाड़ के प्रताप राव चन्द्रसेन जी मुगलो से कड़ा संघर्ष कर रहे थे। दूदा जी भी मुगलो के विरोधी थे। अकबर जानता था कि प्रताप को युद्ध में हराकर भी उसे घुटने टिका नही सकता अतः प्रताप को प्रलोभन देकर अपनी ओर करना चाहा।उसने सर्वप्रथम जलाल खाँ को मेवाड़ भेजा। संधि की बात पर प्रताप मुखर गये। जलाल खाँ के अलावा टोडरमल जी , राजा भगवंतदास और मान सिंह को भी मेवाड़ भेजा गया। विदाई के दिन भोजन के समय विरस घटना के कारण महाराणा प्रताप और मान सिंह में गहरा वैमनस्य हो गया। इस प्रकार मेवाड़ और मुगलो में युद्ध सर्वथा अवश्यम्भावी हो गया।
हल्दीघाटी का महान युद्ध-अपमानित मान सिंह ने अपनी व्यथा अकबर को बतायी। जिससे 7 मार्च 1576 को अकबर ने महाराणा प्रताप का दमन करने का महत्वपूर्ण कार्य मान सिंह को सौंपा।उनकी सेना में आसफ खाँ, गाजी खाँ, माधो सिंह,सलीम,राव लूणकरण अमरसर,जगननाथ कछवाहा , राव खंगार आदि की नियुक्ति की गयी।शाही सेना जून 1576 में बनास नदी के पास मोलेला गाव में पड़ाव डाला।उधर प्रताप ने भी अपनी सेना को सुसज्जित और सुव्यवस्थित किया। उनकी सेना में भील,राणा पुंजा जी,मान सिंह सोनगरा,रामशाह तोमर,शालिवाहन,झाला मान सिंह,हकीम खाँ सूरी भामाशाह,रावत कृष्णदास,वीरवर जयमल मेड़तिया के पुत्र रामदास आदि सम्मिलित थे। महाराणा प्रताप धर्म को समझने वाला सच्चा क्षत्रिय था।इसका सबसे अच्छा उदहरण है कि शिकार करता हुआ मान सिंह प्रताप के शिविर के समीप पहुँच गया था।लेकिन प्रताप ने उस पर आक्रमण नही किया। 18 जून 1576 को अंगारे बरसाती गर्म हवाओं के बीच हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया।प्रताप ने हरावल पर जोरदार हमला किया जिससे शाही सेना में अफरा तफरी मच गयी। महाराणा प्रताप के पहले तलवार के प्रचण्ड प्रहार से बहलोल खाँ के साथ उसका घोडा भी कट गया। युद्ध इतना भयानक था कि हल्दीघाटी खमनोर के बीच अतिशय रक्त बहाव से बनास नदी में खून बह गया। दोनों पक्षो को अपने जीवन और प्राणों से बढ़कर अपनी मान प्रतिष्ठा की चिंता थी। राजा रामशाह जी ने मान सिंह के राजपूतो के विरुद्ध बड़ी वीरता दिखलाई। उनकी रणकौशल से आसफ खाँ भाग खड़ा हुआ। तबाही और मुगलो के टूटते हौसलो को देखकर मिहतर खाँ ने घोषणा की अकबर खुद युद्ध में भाग लेने आ रहे हैं। महाराणा प्रताप ने अपनी घोड़े स्वामिभक्त चेतक के साथ मान सिंह के हाथी पर एड़ लगायी ।प्रताप का भाले से प्रहार से महावत मारा गया तथा हाथी पागल होकर जमीन पर नीचे गिर पड़ा। प्रताप को शत्रुओ के बीच घिरा देखा झाला मन्ना ने उनके राजचिन्ह धारण कर लड़ाई करने लगे । घायल महाराणा प्रताप और चेतक ने युद्ध क्षेत्र छोड़ सुरक्षित स्थान की और चल पड़े। पीछे से मुगलो ने प्रताप का पीछा किया परन्तु भाई शक्ति सिंह ने मुगलो को मारकर प्रताप की रक्षा की । अपनी भूलो पर शक्ति सिंह काफी पछताया और प्रताप से क्षमा मांगी। चेतक ने बलीचा गांव में अपना देह त्यागा। इतिहासकार चन्द्रशेखर शर्मा के अनुसार हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप को विजय प्राप्त हुई।इस युद्ध ने प्रताप की कीर्ति को सामुज्जवल बना दिया।प्रताप के न मिलने अकबर काफी क्रोधित हुआ और मान सिंह की ड्योढ़ी बन्द कर दी। हल्दीघाटी के अद्वितीय युद्ध से यह राजस्थान की थर्मापली और स्वाधीनता प्रेमियों के लिए एक विशिष्ट पूजनीय पुण्य क्षेत्र बन गया।

महाराणा प्रताप का संकटकाल(1576-1586)-हल्दीघाटी युद्ध में मिली जन हानि और मुगलो की बढ़ती घुसपैठों के कारण महाराणा प्रताप को अपने स्थायी निवास स्थानों को छोड़ना पड़ा।उन्हें गुफाओं और जंगलों में रहने को विवश होना पड़ा परन्तु कभी भी अपने सिद्धांतों और धर्म से कभी समझौता नही किया। महाराणा प्रताप ने भीलो को संगठीत कर मुगलो से छापामार युद्ध करते रहे जिससे मुगलो के दांत खट्टे हो गए। मुगलो के निरन्तर अभियानों से महाराणा प्रताप को ही नही उनके परिवार को भी कई समस्याओं से जूझना पड़ा। धन और जन की कमी के कारण महाराणा प्रताप को मुगलो से संघर्ष करने में काफी कठिनाइयां आई।
शाहबाज खाँ ने मेवाड़ में राणा प्रताप को पकड़ने हेतु कई अभियान चलाये परन्तु छापामार युद्ध तकनीक के कारण उन्हें मुँह की खानी पड़ी।1578 में महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार कर लिया किन्तु यह क्षेत्र जल्द ही प्रताप को गवाना पड़ा।भामाशाह ने अपना सारा धन महाराणा प्रताप को देकर दानशीलता का महान उदाहरण प्रस्तुत किया।इसी धन की सहायता से नए सेनिक भर्ती हुए।मेवाड़ को विजित करने के लिए अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना को भी भेजा गया। शेरपुर नामक स्थान पर जब ख़ानख़ाना ने शिविर डाले तो कुँवर अमर सिंह के नेतृत्व में सैनिकों ने ख़ानख़ाना के शिविर को लूट लिया एवं मुग़लों की बेग़म और दासियों को बंदी बना लिया।स्त्रियों के बंधक बनाए जाने से राणा प्रताप अत्यंत क्रोधित हुए एवं उन्हें पुनः ससम्मान शिविर में भेजने का आदेश दिया।जब यह घटना ख़ानख़ाना को ज्ञात हुई तो वे अपने शत्रु राणा प्रताप के गुणों के कायल हो गये।
1582 में दिवेर के युद्ध में मुगलो को करारी शिकस्त मिली। कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध की तुलना मैराथन के युद्ध से की थी।राणा प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह जी ने सुल्तान खाँ का वध किया।1585 में जगनाथ कछवाहा ने मेवाड़ विजय अभियान छेड़ा किन्तु उसे सफलता नही मिली।इसी वर्ष प्रताप ने लूणा जी से चावण्ड को जीतकर अपनी नई राजधानी स्थापित की।अकबर की सैन्य अभियान अन्य स्थानों में होने के कारण मेवाड़ अगले 12 वर्षो तक सुरक्षित रहा।इस समय में महाराणा प्रताप ने चितौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़ पुरे मेवाड़ पर अधिकार कर लिया। आखेट के दौरान प्रत्यंचा टूट जाने के कारण महाराणा प्रताप बुरी तरह से घायल हो गए, जिससे 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप का स्वर्गवास हो गया । लाहौर में जब अकबर को महाराणा प्रताप की मृत्यु का समाचार मिला तो उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े।
हिंदवा सूरज महाराणा प्रताप का मातृभूमि रक्षा और स्वाधीनता प्रेम ने उन्हें इतिहास में सदा के लिये अमर बना दिया। उनका आदर्श चरित्र ऐतिहासिक व्यक्तियों में देखने को नही मिलते।कुशल सेनानायक , स्त्री मान मर्यादा के रक्षक , स्वतन्त्रता प्रेमी , धर्म रक्षक , तेजस्विता आदि महान गुणों के कारण महाराणा प्रताप विशिष्ट हैं। भारत के सर्वप्रथम स्वतन्त्रता सेनानी का गौरव उन्हें ही प्राप्त है। ऐसे महान महापुरुष प्रातः स्मरणीय हैं।

मनु प्रताप सिंह चींचडौली , खेतड़ी