बोधकथा

देहाती दुनिया

दुनिया को ‘आँचलिकता’ से रूबरू करानेवाले हिंदी के पहले उपन्यासकार शिवपूजन सहाय थे। उनकी औपन्यासिक कृति ‘देहाती दुनिया’ की प्रथम पांडुलिपि लखनऊ में गायब हो गई थी, फिर उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ की दूसरी पांडुलिपि लिखा, किन्तु संतुष्ट नहीं होने के बावजूद 1926 में यह उपन्यास प्रकाशित होते ही छा गया।

देहात, बज्जिका तथा ‘और भी स्थानीय भाषा’ सहित साम्प्रदायिक सद्भाव का उन्नत और उत्तम मिसाल लिए ‘देहाती दुनिया’ पहला आँचलिक उपन्यास है, जबकि फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आँचल’ 1954 में प्रकाशित हुई थी, वो तो लेखकीय गुटबाजी के कारण व डॉ. धर्मवीर भारती से मिली प्रशंसा से ही ‘मैला आँचल’ ने ‘देहाती दुनिया’ की आँचलिकता को खारिज कर दिया ! जबकि ‘देहाती दुनिया’ हिंदी का प्रथम आँचलिक उपन्यास है।