कविता

प्यार में छटपटाहट

मैं मित्रो से
कुछ नहीं लेता !
अगर वे मुझे
देने ही चाहते हैं,
तो ‘प्यार’ दे !
बाहर निकलते ही
महफ़िलें सजती हैं,
रात कमरे में
सिर्फ
तन्हाइयां रहती हैं !
किसी के दीदार को तरसता है,
किसी के इंतज़ार में तड़पता है;
ये दिल भी अजीब चीज़ है,
जो होता है खुद का;
मगर किसी और के लिए
धड़कता है!
आज भी
तुम्हारी देह की महक को-
उतनी ही तीव्रता से
पहचानता हूँ;
कि नींद में भी तुम्हें पाने की-
हर करवट
छटपटाहट लिए रहता हूँ !