गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

डर मुझे कुछ नहीं जमाने का..।।
डर है बस तेरे रूठ जाने का..।।
वो न कश्ती में मेरे साथ चलें..
हो जिन्हें खौफ डूब जाने का..।।
फिर सुनाऊँगा हाल ए दिल तुमको..
वक्त आया अगर सुनाने का..।।
कब तलक उसकी जाँ बचाओगे..
हो जिसे शौक जहर खाने का..।।
वो सुनेगा नितान्त के अशआर..
है जिसे शौक गुनगुनाने का..।।
— समीर द्विवेदी नितान्त