ब्लॉग/परिचर्चा

गुरमैल भाई की सफलता का डंका

आज का ब्लॉग एक विशेष ब्लॉग है. विशेष इस मायने में कि आज के ब्लॉग की ब्लॉग संख्या है- 2882 यानी उल्टा-सीधा एक समान. जिधर से मर्जी हो पढ़ो, एक समान – 2882  यह ब्लॉग हमने गुरमैल भाई को समर्पित किया है. गुरमैल भाई लगातार सात साल से हमारे ब्लॉग के साथ जुड़े हुए हैं.

गुरमैल भाई के बारे में तो आप सब लोग जानते ही हैं. गुरमैल भाई 2014 से हमारे ब्लॉग के साथ जुड़े हुए हैं. गुरमैल भाई से हमारा सबसे प्रथम सम्पर्क नभाटा में अपना ब्लॉग, ‘रसलीला’ पर, हमारे 12 मार्च, 2014 के एक ब्लॉग ”आज का श्रवणकुमार” से कामेंट के ज़रिए हुआ. तब से अब तक वे हमारे ब्लॉग पर लगातार दस्तक दे रहे हैं. मजे की बात यह है, कि हमारे ब्लॉग के सम्पर्क में आते ही उन्होंने इतने विस्तार से बहुत समय से रुकी हुई अपने दिल की बातों को साझा किया, कि 17 मार्च को ही उन पर हमारा पहला ब्लॉग आ गया. उसके बाद तो उन पर अनगिनत ब्लॉग्स आए. इन ब्लॉग्स की ई.बुक्स भी बनी हुई हैं, जो आप सब लोग पढ़ चुके हैं. अब तक तो उन्हें ‘अपना ब्लॉग’ वाले, ‘जय विजय’ वाले या कुछ साहित्यिक मंच वाले ही जानते थे, लेकिन आज गुरमैल भाई की सफलता का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है.

गुरमैल भाई के बारे में एक खास बात यह भी है, कि इंग्लैंड में रहने के कारण आजकल उनके पास ‘अपना ब्लॉग’ नहीं पहुंच पा रहा, फिर भी वे बराबर हमारे ब्लॉग के साथ जुड़े हुए हैं. आप देखते होंगे, कि हर ब्लॉग के कामेंट्स में लगभग सबसे ऊपर एक कामेंट में लिखा होता है-
इंग्लैंड से गुरमैल भाई का इस ब्लॉग पर मेल द्वारा संदेश.

सबसे ऊपर इसलिए कि भारत और इंग्लैंड के समय में बहुत अंतर है. गुरमैल भाई सबसे अंत में ब्लॉग देख पाते हैं.

हमने कहा है- ”गुरमैल भाई की सफलता का डंका सारी दुनिया में बज रहा है, लेकिन गुरमैल भाई खुद को साहित्यकार तो क्या, लेखक भी नहीं मानते, पर हम तो यही जानते हैं, कि इनके लिखे हर कामेन्ट में भी इनकी महान साहित्यिकता की झलक मिलती है. हमारे बहुत-से पाठक जानते होंगे कि गुरमैल भाई ने अपनी आत्मकथा लिखी थी, जिसे हमने नौ ई.बुक्स के रूप में संकलित किया है. यह आत्मकथा हिंदी में है.

बात हिंदी की आई तो हम आपको बताते चलें कि गुरमैल भाई अनेक भाषाओं के जानकार हैं और हिंदी, पंजाबी और इंग्लिश भाषा पर उनकी पूरी पकड़ है. उनके अनेक पाठक हिंदी नहीं समझ सकते, उसलिए उनके अनुरोध पर वे अपनी आत्मकथा अब धारावाहिक रूप में पंजाबी में लिखकर फेसबुक में और एक विश्व भर में सुप्रसिद्ध पत्रिका Mann Jitt Weekly Online में प्रकाशित करवा रहे हैं. इसके बारे में अभी हाल ही में उनकी एक मेल आई थी-

लीला बहन,
एक बात मैं आप से शेयर करना चाहता हूँ कि पिछले सात सालों में मेरी सेहत का ग्राफ बहुत नीचे आ गया है और चाहते हुए भी इतना कौंसिंटरेट नहीं कर पाता। फिर भी मेरी कोशिश है कि मैं, मेरी कहानी को पंजाबी में कम्प्लीट कर लूँ। इस के बाद मुझे कुछ सुकून मिल जाएगा। यहाँ की जिस पत्रिका को मैं हर हफ्ते एक किश्त भेजा करता था वो 2020 मार्च से बंद थी। अब उन्होंने इसका ई पेपर शुरू कर दिया है और मैंने फिर से उन को हफ्ते की एक किश्त भेजनी शुरू कर दी है और इस हफ्ते किश्त 135 छपी है और यहाँ इंग्लैंड के लोग और रिश्तेदार उत्सुकता से पढ़ते हैं। Mann Jitt Weekly Online लोग मज़े से पढ़ते हैं। दूसरी बात यह भी है कि इस कहानी में इंग्लैंड के बारे में बहुत कुछ है, इसलिए भी यह लोकप्रिय है। दो दिन हुए, एक मुझ से काफी बड़ी उमर के, बहुत पढ़े-लिखे और अच्छे साहित्यकार का ई.मेल आया जो नीचे कॉपी पेस्ट है ,,,,,. इस मेल से मुझे आप की याद आई कि अगर आप के सम्पर्क में न आता तो यह कभी नहीं हो पाता। कई रिश्तेदारों के कुलवंत को फोन आते हैं कि वो बहुत मज़े से पढ़ते हैं और फिर कुलवंत से इन यादों के बारे में पूछते हैं। इस मेल में मैं आप से विनती करना चाहता हूँ कि अगर आप की लेखनी पर मुख़्तसर कॉमेंट दूँ तो आप बुरा न मनाना। कोई दिन अच्छा होता है, कोई बुरा, इस बात पर ही मुन्नसर होता है कुछ लिखना। उम्मीद है आप गुस्सा नहीं होंगे। गुरमेल भमरा

हमने जवाब दिया-
आदरणीय गुरमैल भाई जी,
सादर प्रणाम, आपकी मेल मिली. आपने हमसे अपने स्वास्थ्य की बात शेयर की, हमें बहुत अच्छा लगा. परमात्मा आपकी सेहत में शीघ्र ही सुधार करेंगे. सबसे पहले तो आपकी आत्मकथा इतने चाव से पढ़ी जाती है, यह जानकर मन बहुत हर्षित हुआ. हमने तो आपको पहले ही कहा था- ”इतनी शानदार-जानदार-नायाब आत्मकथा हमने पहले कभी नहीं पढ़ी.” इसलिए ही हमने इसकी ई.बुक्स भी बना दीं. आप किसी अंक में इन ई.बुक्स का लिंक भी भेज सकते हैं. आपके पास लिंक न हों तो हम आपको भेज सकते हैं. आप अपना ब्लॉग से जुड़े हुए नहीं हैं, फिर भी मन से हमारे ब्लॉग्स को पढ़ते हैं और प्रतिक्रिया भेजते हैं, यह हमारे लिए गर्व की बात है. आप बेशक हमारे ब्लॉग्स पर मुख़्तसर कॉमेंट दें, हमें तो बस आपके मुख़्तसर कॉमेंट से ही आपकी खैरियत का पता मिल जाता है. इसी तरह आशीर्वाद बनाए रखें.

मेल की बात अभी रहने देते हैं, पहले हम बात करते हैं अभी हमारे ताज़ा ब्लॉग ‘उत्पत्ति’ पर गुरमैल भाई की मुख्तसर लेकिन सारगर्भित प्रतिक्रिया थी-
”इंग्लैंड से गुरमैल भाई का इस ब्लॉग पर मेल द्वारा संदेश- लीला बहन , यह ब्लॉग भी बहुत अच्छा लगा . मुहावरे, सुदर्शन भाई की जानकारियां, हमारे आपसी सम्पर्क और मेरी क्यूरी तक सबको उत्पत्ति से जोड़ना बहुत अच्छा लगा.”
गुरमेल भमरा
इस पर सुदर्शन भाई जी की उपप्रतिक्रिया थी-
”आदरणीय दादा जी, सादर चरण स्पर्श. आप चंद पंक्तियों में सारी बात समेट लेते हैं, यह आपकी खासियत है जिसका कोई मुकाबला नहीं. मैं बार-बार आपको हृदय से प्रणाम करता हूँ.”

अब बात मेल की करते हैं. हमारा जवाब था-
आपके पाठक की मेल पढ़ी. कमाल की प्रतिक्रिया लिखी है. मनजीत वीकली में जब उनका लेख छपे, हो सके तो वह भी भेज दीजिएगा.
आपकी छोटी बहिन
लीला

अब देखिए गुरमैल भाई जी के पाठक की शानदार-जानदार-नायाब प्रतिक्रिया, जो हम बिना काट-छांट के आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं-

Dear Bhamara JI !
Sat Sri Akaal – with respect.
Just like to acknowledge and thank you…in advance
For the inspiration I’ve received from:
Your attitude of writing so vividly observed and engrossed
your-self into your past life events and
turning into Pleasant present… NOW.
Magnificently Positive strong visualization helps to fight the LONELINESS.
I have tried to reflect the positivity of this attitude into my article:
Iklaapaa Te Ikaant, which I’ve sent to Mann Jitt Weekly, for the next week.
Wishing you Good Health…Thanking you for inspiring…!
Profoundly grateful.
Gurmit Singh Bhogal.

गुरमैल भाई के पाठक का लेख छप गया है, गुरमैल भाई ने उसका सार लिखकर भेजा है. गुरमैल भाई कुछ भी छिपाते नहीं हैं. उन्होंने लिखा है-
जो गुरमीत भोगल का लेख है उस की कुछ लाइनें लिख रहा हूँ। दरअसल उन्होंने इस लेख में मेरा नाम नहीं लिया लेकिन लिखा उन्होंने मेरे ऊपर ही था।

जिस तरह दो लोगों में अपने मित्र की तलाश में फर्क होता है , इसी तरह अकेलेपन और एकांत में होता है , इनमें से एक की नज़र अपने पास बैठे दोस्त पर ही होती है और दूसरा अपने मित्र को घर की दहलीज़ की ओर ही झांकता रहता है। दोनों हालातों में शारीरिक तौर पर बेशक हम अकेले ही हों लेकिन एकांत में हम खुद ही लोगों को दूर रखते हैं, पर अकेलेपन में लोग हम को दूर रखते हैं।
अकेलेपन में मन हम को सताता रहता है लेकिन एकांत से हमारी रूह को सुकून मिलता है।

आम तौर पर कहा जाता है कि बुढ़ापे में बीमारी इतना दुखी नहीं करती जितना बेदिली करती है और यह बेदिली डिप्रैशन को जन्म देती है।
जिन कुछ समझदार लोगों ने अकेलेपन से बाहर आ कर ज़िंदगी व्यतीत की है उनकी कुछ बातें लिखने की जरूरत है।
१. अगर तुम ताकतवर बने रहना चाहते हो तो कुछ समय एकांत के लिए निकालें।
२. अकेलापन और एकांत दोनों ही बुरी संगत में रहने से कहीं अच्छे हैं।
३. अगर तुम डट कर एक जगह खड़े हो तो इस के अर्थ यह नहीं कि तुम अकेले हो बल्कि इस से सिद्ध होता है कि तुम अकेले ही इतने शक्तिशाली हो कि तुम हालात पर खुद ही काबू कर लोगे।
४. उस शख्स से दूर रहो जो हर वक्त तुम्हें कमज़ोर करने वाली बातें ही बताता रहे।
५. एकांत वह शक्ति है जिस का फायदा कोई-कोई ही उठा पाता है।
६. एकांत में रह कर तुम अपनी पहचान बना सकते हो।
७. जब अकेलेपन को एकांत में बदलने का ढंग आ जाए तो लोगों की भीड़ से दूर रहने में ही आनंद आने लगता है।
८. अकेलेपन में मन डोलने लगे तो मेरे एक दोस्त के अनुभव को साझा कर के देख लेना।
९. अगर दुःख सर पर आ ही जाए तो जरा सोच लेना, हम में विल पावर की शक्ति भी मौजूद है  उस को इस्तेमाल में लाओ।

लीला बहन, लेख तो अभी काफी था और पंजाबी के शब्दों को हिंदी में लिखना भी मुश्किल लग रहा था, फिर भी कुछ कोशिश की है। गुरमेल भमरा

हमने जवाब दिया-
आदरणीय गुरमैल भाई जी, आपका लेख मिला बहुत-बहुत शुक्रिया. लेख इतना ही काफी है. आप अपनी सेहत का ख्याल रखें.
आपकी छोटी बहिन
लीला

अब तो आपको पता चल ही गया होगा, कि गुरमैल भाई की सफलता का डंका सारी दुनिया में बज रहा है.

अंत में एक बार फिर गुरमैल भाई जी के कामेंट्स के बारे में एक बात-
गुरमैल भाई के कामेंट बहुत सारगर्भित होते हैं. पहले तो गुरमैल भाई बहुत बड़े-बड़े कामेंट्स लिखते थे और अपने बारे में बहुत कुछ बताते थे, पर आजकल गुरमैल भाई बहुत संक्षेप में कामेंट्स लिखते हैं, जैसा कि उन्होंने ऊपर इसका कारण भी अक्सर तबियत का नासाज होना बताया है.

आप सब लोग भलीभांति जानते ही हैं, कि हमने गुरमैल भाई जी की आत्मकथा की नौ ई,बुक्स बनाई थीं. इस आत्मकथा की उत्पत्ति भी अचानक ही हुई. मार्च 12, 2014 को ‘आज का श्रवणकुमार’ ब्लॉग में गुरमैल भाई के एक कामेंट से उनका अपना ब्लॉग में पदार्पण हुआ. तब तक उन्होंने हिंदी साहित्य में कुछ नहीं लिखा था. फिर वे अपना ब्लॉग में लेखक बने, जय विजय में ब्लॉगर बने. एक दिन उन्हें अचानक आत्मकथा लिखने का विचार आया. तभी उनको याद आया, कि 19-20 साल पहले उन्होंने आत्मकथा लिखनी शुरु की थी, जो आधे में रह गई थी. उनको आशा नहीं थी कि इतने सालों बाद वह आत्मकथा मिलेगी. उन्होंने पत्नि कुलवंत जी से अपनी आत्मकथा के बारे में बात की. वे झट से उनकी आत्मकथा के वे 19-20 पेज ले आईं. बस उत्पत्ति हो गई गुरमैल भाई की आत्मकथा ”मेरी कहानी” की. इस आत्मकथा के 201 एपिसोड बने, हर 21 एपिसोड की हम ई.बुक्स बनाकर उनको भेंट करते रहे. उनका उत्साह बढ़ता गया और उन्हें ”जय विजय रचनाकार सम्मान” से सम्मानित किया गया. फिर तो सम्मान उनकी झोली में आते ही गए और आज दुनिया भर में गुरमैल भाई की सफलता का डंका बज रहा है. यह किस्सा हमने ”उपलब्धियां दबे पांव आती हैं” में भी लिखा है.

गुरमैल भाई, सबसे पहले आप अपनी सेहत का ध्यान रखें और जितना हो सके, उतना काम करें.

पढ़ने योग्य विशेष ब्लॉग-
गुरमैल भाई की कलम से

चलते-चलते
आज ही हमने फेसबुक पर देखा, गुरमैल भाई अपनी आत्मकथा को पंजाबी के साथ-साथ इंग्लिश में भी प्रकाशित कर रहे हैं. उसकी भी 261 कड़ियां प्रकाशित हो चुकी हैं.

गुरमैल भाई जी के ब्लॉग या लेखन के बारे में लिखने बैठ जाएं, तो अनगिनत पृष्ठ लिखे जा सकते हैं. आज बस इतना ही. शेष आपके-हमारे द्वारा कामेंट्स में.

जय विजय में गुरमैल भाई का ब्लॉग

http://jayvijay.co/author/gurmailbhamra/

7 thoughts on “गुरमैल भाई की सफलता का डंका

  1. लीला बहन , मार्च 2014 से ले कर आज तक जो हुआ , वोह मेरे लिए ऐसा है जैसा मैंने सपने भी नहीं सोचा था . एक दफा मैने राज कुमार भाई के ब्लौग में आप के बारे में कॉमेंट लिखा था कि आप ज्ञान बांटते हो और जो एक दफा आप के सम्पर्क में आ गिया वोह हमेशा के लिए आप से जुड़ गिया . आप की यह ख्सीह्त ही है कि जो भी आप के सम्पर्क में आया , हमेशा के लिए आप से जुड़ गिया . यहाँ मैं यह भ लिख दूँ कि विजय सिंघल जी नए लेखकों को बहुत उत्साह्त करते हैं जैसे उन्होंने मुझे उत्साह्त किया

    1. आदरणीय गुरमैल भाई जी, सादर प्रणाम, आपको ब्लॉग ”सफलता का डंका” की प्रस्तुति बहुत सुंदर और अद्भुत लगी, यह जानकर मन हर्षित हुआ. भाई हम खुद कुछ नहीं करते, जो कर्तार करवाता है, वही करते हैं. आप में प्रतिभा थी और आपने मेहनत की, आगे बढ़ गए. विजय भाई जी के बारे में आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. वे नए लेखकों को आगे बढ़ने का अवसर भी देते हैं, सहायता भी करते हैं और प्रोत्साहित भी करते हैं. ब्लॉग का संज्ञान लेने, इतने त्वरित, सार्थक व हार्दिक कामेंट के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

  2. आदरणीय गुरमैल भाई जी, सादर प्रणाम, आपको ब्लॉग ”सफलता का डंका” की प्रस्तुति बहुत सुंदर और अद्भुत लगी, यह जानकर मन हर्षित हुआ. आपकी लाजवाब प्रतिक्रिया हमारे लिए अनमोल आशीर्वाद है. भाई, हमने तो वही लिखा, जो आपने हमें लिख भेजा है, यह बात तो सच है ही, कि आपकी सफलता का डंका दुनिया भर में गूंज रहा है. आप सब लोग हमसे इतना स्नेह-प्यार रखते हैं, यही स्नेह-प्यार ही हमारी पूंजी है. यह भी सच है, कि ब्लॉग पर आपके आने से बहार आ जाती है. इंग्लैंड में रहते हुए भी आप सच्चे भारतीय हैं, यह भी आपकी विशेषता है. आपने सुदर्शन भाई की लेखनी के बारे में लिखा है. वास्तव में सुदर्शन भाई की लेखनी में जादू है.हम आपको सबकी प्रतिक्रियाएं भी भेज रहे हैं. ब्लॉग का संज्ञान लेने, इतने त्वरित, सार्थक व हार्दिक कामेंट के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

  3. गुरमैल भाई पर हमारा सबसे पहला ब्लॉग था- ”गुरमैल गौरव गाथा’. उसमें गुरमैल भाई की दुर्घटना की अत्यंत मार्मिक गाथा है.

  4. सुदर्शन भाई ने पंजाबी में आपकी आत्मकथा के एक एपिसोड की जो फोटो भेजी थी, वह इतनी लंबी कड़ी आपके हौसले का जीवंत प्रमाण है. जन्मजात प्रतिभा के साथ परिश्रम भी हो, तो पंख लगने स्वाभाविक हैं.

  5. गुरमैल भाई, कुलवंत जी ने आपके काम को इतना सहेज कर रखा था, कि आपके मांगते ही तुरंत लाकर सामने रख दिया. इसी के कारण आज लोगों को हिंदी, पंजाबी और इंग्लिश में आपकी आत्मकथा पढ़ने को मिल रही है. यही आत्मकथा ही तो बजवा रही है- दुनिया भर में सफलता का डंका! आपके हौसले का तो जवाब ही नहीं

  6. गुरमैल भाई किन परिस्थितियों में भी काम में जुटे रहते हैं, उसकी एक मिसाल- हमने गुरमैल भाई को आंस्सो पर छोटी-सी कविता लिखने के लिए कहा था. उस पर गुरमैल भाई का जवाब था-
    लीला बहन , कविता लिखना तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है क्योंकि इस के लिए सोचने पर मेरा सर बहुत दर्द करने लगेगा। अभी सेहत भी वोह नहीं है। दो दिन तो पैर ही सूजे रहे और अभी भी कुछ बुखार है। जिस भी काम को मुझे ज़्यादा सोचना पढ़े उस से सर चकराने लगता है। गुरमैल भाई आपका जवाब नहीं

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