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विचारों का दर्पण –दृष्टिकोण

 

विचारों का दर्पण-दृष्टिकोण

किसी भी दृश्य की सुन्दरता देखने वाले की दृष्टि की पवित्रता पर निर्भर करती हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो क्यों कोई व्यक्ति किसी दृश्य को घृणा की दृष्टि से देखता है जबकि वहीं दृश्य दूसरा व्यक्ति मनोहारी दृष्टि से देखता हुआ उसके आनन्द की अनुभूति करता है
सुंदरता और कुरूपता देखने वाले की दृष्टि में ही विद्यामन होती हैं। जैसी हमारी सोच,हमारी दृष्टि होगी सृष्टि हमें वैसी ही दिखाई देगी।

एक बार कोई अंधा व्यक्ति किसी मंदिर में जाकर मौन प्रार्थना कर रहा था, उसी समय कुछ लोग भीं वहां आकर पूजा करने लगते हैं। अंधे व्यक्ति को जब इस प्रकार मौन प्रार्थना करते देखकर पड़ौस में खड़े व्यक्ति ने अपने साथी से कहा ->अंधे व्यक्तियों को जब कुछ दिखाई नहीं देता हैं तब यहां आने का क्या प्रायोजन हैं?

तब अंधे व्यक्ति ने कहा -> तो क्या हुआ,, ऊपर वाले को तो सब कुछ दिखाई देता हैं ना। यहां आने वाले को दृष्टि की नही सही दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

आइए दोस्तों ! एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं।
एक गिलास में थोडा पानी भरा हुआ है, कुछ लोग कहेंगे->गिलास पानी से आधा भरा हुआ है तो कुछ लोग ये भीं कहेंगे कि गिलास आधा खाली हैं। प्रत्येक व्यक्ति के सोचने की क्षमता अलग अलग होती हैं, सभी व्यक्तियों का एक ही बात पर एक सा दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता, क्योंकी सबकी अपनी अलग एक सोच होती हैं। गिलास आधा भरा हुआ है ऐसी आशावादी सकारात्मक सोच को उत्तम कहा जा सकता है। कहने का अभिप्राय ये है कि आशावादी सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण में अनुक्रिया होती है जो सदैव प्रगति के पथ का अनुगमन करती है। इसी कारण व्यक्ति प्रसिद्धी के शिखर को जल्द ही चूम लेता है और दूसरे लोगों के लिए एक प्रेरक बन कर उभरता है।

जबकि आधा गिलास खाली है, ऐसा दृष्टिकोण रखने वाले की सोच निराशावादी नकारात्मक होती है जो प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करती है । उसकी सफलता संदिग्ध होती है क्योंकि नकारात्मक विचारों से निर्बलता का उदय होता है ।

दोस्तों! इसलिए जीवन में सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण ही रखें। असफलता भी आएगी,तो आने दे बल्कि उन असफलताओं को चिढ़ियों की तरह उपयोग कर अपने लक्ष्य पर नज़र रखें। हर असफलता कुछ शिक्षा प्रदान करती है उसका लाभ उठाइए। असफलता ही हमें यह सिखाती है कि हमारे प्रयासों में क्या कमी रह गई हैं ।
इब्राहिम लिंकन 17 बार पराजित होने के उपरांत ही चुनाव जीत पाए थे और राष्ट्रपति पद तक पहुंचे थे। ये उनकी सकारात्मक सोच का परिणाम था।

आइजैक राबी इस बारे में अपना मत व्यक्त करते हैं कि मेरी मां ने मुझे अनजाने में ही वैज्ञानिक बना दिया । ब्रुकलिन में हर यहूदी मां अपने बच्चे से यह पूछती है कि आज तुमने स्कूल में क्या नया सीखा? परन्तु आइजैक राबी कहते हैं कि मेरी मां द्वारा पूछा गया सवाल इससे भिन्न दृष्टिकोण रखता है । वह पूछती है कि बेटा ! क्या तुमने अपने शिक्षक से आज कोई अच्छा प्रश्न पूछा ? मेरी मां के द्वारा प्रश्न पूछने के इसी दृष्टिकोण ने अनायास ही मुझे वैज्ञानिक बना दिया । प्रश्न पूछने के ऐसे अंतर की वजह से ही मान घटनाएं घटित हो जाती है जिसकी कल्पना हम सपने में भी नहीं करते।

क्रिया स्वाभाविक है। जब भी क्रिया होगी तो उसके उपरांत दो बातें होगी या तो अनुक्रिया होगी अथवा प्रतिक्रिया । अनुक्रिया का होना अच्छा है क्योंकि इसमें सकारात्मक भाव छिपा रहता है। यह भाव ही जीवन को जीना सिखाता है,हमें सदा इसी अनुक्रिया का अनुकरण और अनुसरण करना चाहिए । इससे जीवन में अनायास ही खुशियां छाने लगती है और व्यक्ति अपने जीवन को ऐसे जीने लगता है, जैसे उसके जीवन में हमेशा के लिए मधुमास छा गया हो। ऐसे लोग प्रत्येक पल को उत्सव के रूप में देखते हुए इसका भरपूर आनंद उठाते हैं,जिंदगी का पूरा पूरा आनंद उठाना है तो जीवन के उज्जवल पक्ष को ही देखें । अपनी दृष्टि को स्वच्छ और पवित्र बनाए रखें एवं अपने दृष्टिकोण को नकारात्मकता की ओर ले जाने से रोके । क्योंकि नकारात्मक विचारों से मानसिक वैभवता नष्ट हो जाती है अर्थात कोई भी वस्तु कितनी ही नकारात्मक क्यों ना हो परंतु कहीं न कहीं सकारात्मक जरूरत होती है,उसे खोजने का प्रयास करें तो वह अवश्य मिलेगी और हम वो इंसान हैं जो सकारात्मक मस्तिष्क से आगे बढ़ते हैं । हम ये काम भी पूरी निष्ठा के साथ करें तो अवश्य ही इसे एक नया दृष्टिकोण दे सकते हैं।

सविता जे राजपुरोहित

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