बाल कहानी

बाल कहानी : आकर्षक खिलौने

           अध्यापक ठाकुर जी कक्षा सातवीं में आए। बोले- “बच्चों ! कल से दशहरे की छुट्टी हो रही है पाँच दिनों के लिए; यानी शुक्रवार तक। बच्चे खुश हो गए। ठाकुर जी फिर बोले- “दशहरे की छुट्टी का आनंद लेने के साथ तुम सबको एक गृहकार्य भी करना है; और उसे कम्प्लीट करके जब स्कूल आओगे तब लाना है।
          “क्या करना है सर जी गृहकार्य में; और जिसे स्कूल भी लायेंगे?” बच्चे एक स्वर में बोले।
          “सबको खिलौना बनाकर लाना है; चाहे वह मिट्टी का हो, लकड़ी का हो या चाहे फूल, पत्ते, पत्थर का हो ; पर स्वयं का बनाया हुआ होना चाहिए। ध्यान रहे, सुंदर हो, मजबूत हो और आकर्षक भी हो। स्कूल आने के दिन उसे अनिवार्य रुप से लाना ही है।” ठाकुर जी ने कहा। बच्चों ने हाँ में सर हिलाया। फिर छुट्टी हो गयी।
            दशहरे की छुट्टी खत्म हुई। बच्चे खुद के बनाये हुए खिलौने लेकर स्कूल आए। सबने बरामदे पर खिलौनों को रखा। अध्यापक ठाकुर जी ने सभी बच्चों से कहा कि तुम सब बारी-बारी अपने-अपने खिलौने के बारे में बताते जाओ।”
           “सर जी ! यह एक कार है। इसके सभी कल-पुर्जे बहुत मँहगे हैं। इन सबको मैनें स्वयं खरीद कर बनाया है। बहुत खर्च करना पड़ा, तब यह इतना अच्छा बन पाया।” नीतिश ने सबसे पहले अपना खिलौना दिखाया।
           फिर राघव बोला- “यह एक डबलस्टोरी बिल्डिंग है सर जी। इसकी डेंटिंग-पेंटिंग मैनें खुद की है ।” राघव की आवाज में बड़ा दम था।
          महेंद्र की बारी आई। उसने भी अपने खिलौने का मुस्कुराते हुए परिचय दिया-” सर जी! देखिए न… मैं स्वयं हूँ। मैनें स्वयं को एक खिलौने का आकार दिया है। इसके लिए मैनें अपनी मम्मी से पैसा लिया है। मेहनत तो कम की है मैनें, पर पैसा बहुत लगाया है सर। क्यों , मैं अच्छा लग रहा हूँ न सर?”
          “यह एक एंड्राइड मोबाइल फोन है सर जी। गीतिका सबको अपना खिलौना दिखाते हुए बोली- “लग रहा है ना सर बहुत बढ़िया ?”
           इस तरह बच्चों ने अपने-अपने खिलौने का प्रदर्शन किया। अब सबकी नजर नीरज पर टिकी। वह चुपचाप से सकुचाया हुआ बैठा था। अपनी बारी आने पर भी वह खिलौना नहीं दिखा रहा था। कहने लगा- “मेरा खिलौना तो इन खिलौनों के सामने कुछ नहीं है सर जी, मैं क्या दिखाऊँ ?”
            “अरे नीरज, तुम जो भी बना कर लाए हो; दिखाओ।” अध्यापक नीरज की पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले।
             “सर जी मेरे मम्मी पापा तो चंद्रपुर कमाने खाने गए हैं। घर में मैं, दादी और मेरी छोटी बहन रहते हैं। हमारे घर पैसा वैसा नहीं है सर।” नीरज अपने खिलौने वाले थैले को पीछे छुपाने लगा।
            “क्या है उसमें जी, हम लोग भी देखेंगे।” ठाकुर जी ने बड़े प्यार से नीरज के सर पर हाथ रखा।
            “अंत में नीरज ने अपना खिलौना सबके सामने टेबल पर रख दिया। खिलौनों को देखकर अध्यापक ठाकुर जी गदगद हो गए। बच्चे भी बड़ी अचरज भरी नजरों से एक-दूसरे को देखते हुए नीरज के खिलौनों को निहार रहे थे- ढेर सारे मिट्टी के सुंदर छोटे-छोटे व विभिन्न आकृतियों के दीये थे। तभी अध्यापक ठाकुर जी मुस्कुराते हुए बोले- “वाह ! बहुत सुंदर-सुंदर दीये बनाये हैं तुमने। यह सबसे बड़ा व सुंदर दीया किसलिए…नीरज ?”
            नीरज ने कहा- “सर जी ! इसे मैं दीपावली की रात को अपने स्कूल के मुख्य द्वार पर जलाऊँगा।
            सभी बच्चों की नजर सिर्फ नीरज की दीये पर थी।
— टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”

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