लघुकथा

रावण से मुलाकात

कल सुबह अचानक नेहा की  स्कूटी के सामने हट्टा कट्टा दसशीश वाला रावण आ गया, नेहा ने जैसे तैसे ब्रेक लगाये और कहा, ‘अंकल क्या करते हैं ? बीस बीस आंखे होते हुवे भी टकरा गये क्या लड़की देख कर जानबूझ टकराये हो |’
दशानन गुस्से में तमतमा कर बोले, ‘लड़की तमीज से बात कर तुम मेरी बेटी समान हो’
मैं व्यंग से मुस्कुराई ‘अच्छा बड़े ज्ञानी बन रहे हैं आज आप। आप वहीं हैं ना जिन्होंने मां सीता का अपहरण किया था कल दशहरा है लोग आपको जलाने की तैयारी कर रहे हैं.’
रावन का सिर शर्म से झुक गया वो बोला ‘हां मैने सीता का अपहरण किया था परिणाम भी भुगता !!पर पुत्र मेघनाद की कसम  मैने उनसे कोई जबरदस्ती नहीं की.उनको छुवा तक नहीं उनकी गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई | तुम अपने आस पास के कलियुगी ईंसानो को देखो जो अपने चेहरे कितने मुखौटे लगाये घूम रहे है कितनी ईज्जत देते हैं ना उम्र का लिहाज ना  रिश्तों का ; दो तीन साल की बच्ची तक को नहीं बख्शते !! उनका कोई नैतिक चरित्र नहीं है कभी कोख में मारते तो कभी हवस का शिकार करते है येनकेन बच गई तो दहेज बलि | फोकट में मेरे चरित्र पर अंगुली उठा रही हो ये कलियुगी इंसान मेरे पैर छूने लायक भी नही हैं !मन बहलाने को कुछ भी करो जलावो ! मैने सुना है बहनें भगवान से मुझ जैसा भाई  मांगती हैं : जो औरतों को इज्जत दे.’
अब शर्म करने की बारी नेहा की थी, नेहा से  कोई जबाब देते नहीं बना और वो पतली गली से खिसक ली !
— गीता पुरोहित