क्षणिका पद्य साहित्य

क्षणिकाएँ

1प्रेम के तराजू पर सब हार जाओगे
गर प्रेम को सच्चे दिल से निभाओगे
प्रेम ही पूजा प्रेम इबादत
प्रेम जन जन की भाषा है

दर्द अपना भी भूल जाओगे

गर प्रेम को अपनी रीत तुम बनाओगे ।

2जिंदगी के पनघट पर हर गीत तुम्हारा है
जिंदगी ढलती है पर संगीत तुम्हारा है
क्यों न प्यार करें फिर हम खुद को ही
जब ये दुःख सुख भी सिर्फ तुम्हारा है ।

3कौन कब मरता है..किसी के बिना।
अपनों को खोकर भी जीना पड़ता है ।।
जिंदगी है सिर्फ एक तमाशा और कुछ नहीं ।
कठपुतली हैं हम सब उसके हाथों नाचना पड़ता है

4सिगरेट तुमको भाती नहीं फिर
दिल जलाने की आदत क्यों जाती नहीं
सौतन है देर से आने की अदा
क्यों रुलाने की आदत तुम्हारी जाती नही

5टूटने का दर्द जरा उससे पूछना
खुशियों के इंतजार में जिसने
सदियां रोकर गुजारी हों

6 लिखा था कभी किसी ने प्रेम पर
आज की जिंदगी से वो यूँ उड़ गया
जैसे पेड़ों से पत्ते जैसे दिलों से मिठास
जैसे कोयल की आवाज जैसे सुर से आलाप

7प्रेम पर अंकुश कभी निरंकुश भी बना देता है
तोड़ जाता है कोई दिल पर पत्थर बना देता है

8मंजिल गर मिले तो एक ही शर्त पर
दिल न टूटे किसी का मेरी वजह से
चलते रहें मेरे कदम सच के पथ पर
करती रहूँ दुआ यही मैं अपने रव से

9आँखों में आँसू
और दिल में जज्बात
छिपाए भी तो दिल कैसे
जब बँधे हों दोनों हाथ

10जीने का सहारा तुम बन गए
हर गम की दवा तुम बन गए
क्या कहूँ और कैसे कहूँ
मेरा तो सारा जहाँ तुम बन गए ।

वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

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