कुण्डली/छंद

कोमल की कुण्डलियाँ.

अपना कोई है नहीं, मतलब का संसार।
स्वार्थ जहाँ पर पूर्ण हो, वो ही रिस्तेदार।
वो ही रिस्तेदार, खास हैं तब हो जाते ।
जब तक निकले काम, तभी तक रिस्ते नाते।
कह ‘कोमल’ कविराय, जगत है कोरा सपना।
मुश्किल में दे साथ, वही होता है अपना ।

ऊँचे-ऊँचे हो गये, आलीशान मकान ।
हल्के-हल्के हो गये, लेकिन अब इंसान ।
लेकिन अब इंसान, हुआ दौलत में अंधा।
खूब रहा फल फूल, झूठ का गोरखधंधा।
कह ‘कोमल’ कविराय, पतन में गिरता नीचे।
करे नीच करतूत, महल हैं ऊँचे-ऊँचे ।

बदला-बदला लग रहा,अब तो यह संसार।
जहर व्याप्त सा हो गया,ऐसी चली वयार।
ऐसी चली वयार, आदमी है वौराया ।
मानवता को छोड़, घूमता है पगलाया ।
कह ‘कोमल’ कविराय, हुआ है मौसम पगला।
इसका लगे मिजाज, आजकल बदला-बदला।

— श्याम सुन्दर श्रीवास्तव ‘कोमल’