कुण्डली/छंद

कोमल की कुण्डलियाँ.

अपना कोई है नहीं, मतलब का संसार।
स्वार्थ जहाँ पर पूर्ण हो, वो ही रिस्तेदार।
वो ही रिस्तेदार, खास हैं तब हो जाते ।
जब तक निकले काम, तभी तक रिस्ते नाते।
कह ‘कोमल’ कविराय, जगत है कोरा सपना।
मुश्किल में दे साथ, वही होता है अपना ।

ऊँचे-ऊँचे हो गये, आलीशान मकान ।
हल्के-हल्के हो गये, लेकिन अब इंसान ।
लेकिन अब इंसान, हुआ दौलत में अंधा।
खूब रहा फल फूल, झूठ का गोरखधंधा।
कह ‘कोमल’ कविराय, पतन में गिरता नीचे।
करे नीच करतूत, महल हैं ऊँचे-ऊँचे ।

बदला-बदला लग रहा,अब तो यह संसार।
जहर व्याप्त सा हो गया,ऐसी चली वयार।
ऐसी चली वयार, आदमी है वौराया ।
मानवता को छोड़, घूमता है पगलाया ।
कह ‘कोमल’ कविराय, हुआ है मौसम पगला।
इसका लगे मिजाज, आजकल बदला-बदला।

— श्याम सुन्दर श्रीवास्तव ‘कोमल’

श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल'

पिता का नाम -श्री बनवारी लाल श्रीवास्तव शिक्षा - हिंदी स्नातकोत्तर सम्प्रति - हिंदी व्याख्याता प्रकाशित कृतियाँ- 1- हम भारत की शान बनेगें 2 - प्यारे बच्चे प्यारे गीत 3- आलोक शिशु गीत भाग- 2 प्रसारण - आकाशवाणी छतरपुर मध्यप्रदेश से बाल कहानी और बाल गीतों का प्रसारण पुरुस्कार एवम सम्मान -अनेक सामाजिक , साहित्यिक एवम शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवम पुरस्कृत विशेष - मेरे व्यक्तित्व एवम कृतित्व पर केंद्रित बुंदेलखंड विश्विद्यालय झांसी में वर्ष 2013 को कु० श्रुति गुप्ता द्वारा ,"हिंदी बाल साहित्यन्तर्गत कोमल जी का योगदान " शीर्षक से लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत पता - व्याख्याता हिंदी अशोक उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय लाहार जिला -भिंड (म०प्र०) पिन कोड - 477445 व्याख्याता-हिन्दी अशोक उ०मा० विद्यालय, लहार जिला-भिण्ड, म०प्र० मो०- 8839010923