लघुकथा

वादा

दीपावली का दिन था, लेकिन दीपों की अवलि नदारद थी. उनकी जगह चीनी लड़ियों ने जो ले ली थी.
पूजा के लिए जो दीए जलाए गए थे, वे भी मायूस-से लग रहे थे ठीक समीक्षा की तरह.
”इस बार भाई दूज के लिए भाई-भाभी का न्यौता आएगा कि नहीं!”वह सोच रही थी.
तभी मोबाइल पर भाभी का नाम चमका- ”समीक्षा, भाई दूज के टीके के लिए किस समय आ रही हो, तुम्हारे भैया बहुत उदास हैं!”
”मैं भी तो बहुत उदास हूं भाभी, बस सुबह-सुबह आ जाऊंगी, नाश्ता वहीं करूंगी.” उसने झट से कहा, कहीं उसका निश्चय डगमगा न जाए!
समीक्षा की तरह दीयों की मुस्कुराहट भी खिल उठी थी. कितनी कीमत चुकाई थी उसने अपनी खोई मुस्कुराहट को पाने के लिए! भाई के पास जाने के लिए तैयार होते-होते वह सोच-सागर में डूब गई.
”वार-त्योहार में सब वैर-भाव भुला देने चाहिए, हर पर्व के निबंध में समीक्षा यही लिखती आई थी, पर क्या वो स्वयं ऐसा कर पाई थी!” समीक्षा ने खुद की समीक्षा की.
”भाई ने रक्षा बंधन पर घर आने के लिए कितने निहोरे किए थे, पर वो जरा-सी बात दिल से लगा बैठी थी और भाई को राखी बांधने नहीं गई. क्या यह सही था!” उसने खुद से सवाल किया.
”भतीजे मनु की सगाई के न्यौते को भी उसने ठुकरा दिया था. सिर्फ इसलिए कि हमेशा सब कुछ अपने आप कर देने वाले उसके भाई ने सिर्फ एक बार रिजर्वेशन करवाने जाने में असमर्थता जाहिर की थी! यह क्या बड़ी बात थी! वह भी तो कई बार अपनी ननदों के साथ ऐसा कर चुकी थी, पर उन्होंने भाई-भाभी की मजबूरी समझकर नाता जोड़े रखा.” इतनी-सी बात के लिए अपनी मूर्खता पर वह खिन्न थी.
”इस बार भाई-भाभी से इतना पक्का नाता जोड़ आऊंगी, कि रिश्तों की मजबूती के लिए दुनिया हमारी मिसाल देगी.” टॉप्स पहनते-पहनते समीक्षा ने खुद से वादा किया.