कविता

नियम से रहना सिखा दें

आसमां से पूछना था
अपने विशाल आनन के
असंख्य तारों को
कैसे तुमने संभाला है?
चांद की शीतलता को
कैसे तुमने सहेजा है?
सूरज की तपिश को
किस तरह अपने आंचल में समेटा है?
दिन रात की परिधि में घूमते हुए
तूझे कभी थकते हुए नहीं देखा।
अहंकार में चांद सूरज को
टकराते हुए नहीं देखा
तारों को कभी नादानी में
आसमां तबाह करते नहीं देखा।
दिन रात को कभी झगड़ते नहीं देखा।
इतना संयम, इतना धैर्य
तूने कहां से है पाया?
ये राज जरा
हम इंसानों को भी बता दें
हम नादान इंसानों को भी
संयम नियम से रहना सिखा दें!!

— विभा कुमारी “नीरजा”