मुक्तक/दोहा

अलग वही इंसान

जीवन के हर जंग को ,लड़ता सीना तान,
हार न माने जो कभी,अलग वही इंसान ।

इम्तिहान लेती रही ,जीवन की हर भोर ,
लेकिन हम सोते रहे ,लिए ख्वाब की डोर।

दौलत जितनी भी मिले ,भरते जा हुशियार ,
जीवन में मिलते नहीं ,ये मौके हर बार।
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दौलत का जिनको नशा ,होता है सरकार ,
वो होते हैं मतलबी ,वो होते मक्कार।

जख्म दिया है आपने, दवा दीजिये आप ,
जीवन भर बस इस तरह ,देना प्रेम अनाप।

— महेंद्र कुमार वर्मा