लघुकथा

लघुकथा : बेटी 

ज्यो ही फोन की घंटी बजती है, अंदर से आवाज़ आती है -“माँ सगीना दीदी का फोन आया है “पार्वती सगीना का  नाम सुनकर प्रसन्नता से छलकती हुई आती है और कहती है बेटा सगीना कैसी हो तुम? ससुराल वाले कैसे है, जमाई बाबू कैसे है,,, इतना सुनते ही सगीना की आँखे भर आई और कहती है माँ यहाँ सब कुशलमंगल है, तुम चिंता मत करना,  माँ मैं भी ठीक हुँ |पार्वती कहती है -कही फिर से तुम्हें दहेज़ का ताना तो नहीं मरते है तेरे ससुराल वाले,,, सगीना -माँ तुम तो जानती हो ये लोग कैसे है, हाँ बेटा मैं जानती हुँ |सुनो बेटा मैं तेरे लिए पायल बना कर रखी हुँ वो भी खीरा के दाने जैसी डिज़ाइन वाली, जोकि तुझे बहुत पसंद है ना |देख सगीना घर की स्थिति तो तू जानती है न दूसरे के घर मे चौका बर्तन करके जो रूपये मिलते थे उसी से घर चलता है उन्ही रूपये मे कटौती करके तेरे लिए यह पायल बनाई हुँ|सगीना अपने दुखों को भूल कर खुशी से कहती है माँ मुझे वो पायल दे देना, देखना माँ कही देर ना हो जाय लेकिन पार्वती इस बात को नहीं समझ पाई |ठीक है माँ मैं फिर बात करती हुँ, यह कहकर फोन रख दिया |फोन को रखने के  बाद  पार्वती को लगता है की आज उसके साथ कुछ अनहोनी होने वाला है परन्तु वह बात ही बात मे उस बात को भूल जाती है
              उधर सगीना के ससुराल वाले फिर उस पर बरस पड़े, तेरे बाप ने क्या दिया फूटी कौड़ी तक नहीं दिया है तुझे इस घर मे रहने का कोई हक नहीं है उसका पति सगीना को मारा, जलील किया, सिगरेट के जले हुए मुँह से उसके शरीर पर घोपा और अंत मे गला घोंट कर मार दिया,,,
बाद मे उसे किचन मे गैस खुला छोड़ कर रख दिया, सगीना के ससुराल वाले खुद ही चिलाने लगे की मेरी बहु ने आत्महत्या कर ली यह सुनकर लोगों का जमघट हो गया, प्रशासन भी  आ पहुँचे और सगीना की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया, ज़ब पार्वती को यह खबर मिली तो छाती को पिटते सगीना के घर आकर रोने लगती है ऐसा नहीं हो सकता, मेरी बेटी आत्महत्या नहीं कर सकती, सगीना मुझे कहा करती थी की माँ ये लोग मुझे मारने  की साजिश चला रहे है कभी गैस खुला छोड़ देते है तो कभी मिट्टी तेल मुझ पर डाल देते, माँ मुझे बचा लो इन दरिंदो से, आज मेरी बेटी को मार डाला इन राक्षसो ने,,, मैं क्या करती सगीना के बचपन मे बाबू जी इस दुनिया को छोड़ गए, भाई छोटा है ना पैसा है ना पहुंच है, मेरी सुन्दर कली को मार डाला फुट -फुट कर रोती है पार्वती,,, और वो पायल को निकाल  कर कहती है ये सगीना की अंतिम इच्छा थी पायल पहनने,  की वो भी पूरा नहीं कर पाई मैं |सगीना की माँ आज भी उस पायल को निकलकर कहती है इसमें सगीना की यादें बसी है और उसे देख देख रोती है,,,,
— राज कुमारी 

राज कुमारी

गोड्डा, झारखण्ड