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अलंकृत: चेहरा या चरित्र

अलंकृत:चेहरा या चरित्र !
आज के अत्याधुनिक युग में,भौतिक चक्काचौंध से धुंधला गयी हैं नजर। फैशनपरस्ती की ऐसी हवा चली हैं कि फटी पैंट, देहदर्शन करते वस्त्र आज सब को पसंद आते हैं। दिखावा, आडंबर, भड़काऊ भाषण आज हमारी शान हैं। नकाबपोश, सजे सजाये चेहरे को अलंकृत कर हम महकना चाहते हैं, सब से सुंदर, सब से धनाढ्य दिखना चाहते हैं। विडंबना यही हैं कि बाहरी स्वरूप को सत्य मान लिया जाता हैं। यही हम धोखा खा जाते हैं। बिना सौरभ फूल की कोई अहमियत नहीं होती। बिना चमक तारों की कोई कद्र नहीं, बिना संयम, समर्पण परिवार में समता नहीं होती।
सुंदरता के साथ शील, संस्कार, चारित्र्य न हो, मानव जीवन की कोई महत्ता नही। सुंदरता मुरझा सकती हैं। चारित्र्य कभी निस्तेज नहीं हो सकता। सदाचार, सत्चरित्र हमेशा पूजनीय, वंदनीय, अनुकरणीय होता हैं। विनय, विवेक मानवता की पहचान हैं। संस्कार, संस्कृति हमें इंसान से भगवान बना देती हैं। केवल खोखली सुंदरता हमें हैवान बना देती हैं। अलंकृत चारित्र्य हो। क्षणभंगुर सुंदरता, बुलबुले-सा होगा अलंकूत चेहरा। सुंदर चेहरे पर सुशील चारित्र्य का सेहरा हो तो बात बने। सुंदरता के साथ, शील, चारित्र्य, संस्कार हो तो सोने पर सुहागा।