लघुकथा

लघुकथा – ऑफिस का रावण

रावण दहन के दूसरे दिन ऑफिस के दूसरे कमरे में अचानक से ” गदध ! गदध ! ” दो बार आवाज सुनाई पडी । मैं कुछ समझ न सका । हो सकता है वो मेरा केवल एक भ्रम था । तब मैं अपने कमरे में बैठा एक विधवा पेंशन के मामले को समझने का प्रयास कर रहा था । सप्ताहांत उस पेपर को रांची सी एम् पी एफ ऑफिस से लौटा दिया गया था ” गलतियों को सुधार कर पुनः भेजें ” टिप्पणी में लिखा हुआ था । लेकिन गलतियों का उल्लेख नहीं किया गया था । मुझे इस पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। हजार रुपए कमीशन ना पहचा तो ऑफिस के बड़ा बाबू ने पेपर ही वापस लौटा दिया । कहता है अगले माह जय माता दी का दर्शन करने कैसे जा पाएंगे ! ! धिक्कार है तेरा माता दर्शन का-जो एक विधवा असहाय स्त्री का दुःख मजबूरी दिखाई नहीं देती तूझे । मैं इसी पर विचार कर रहा था कि वो ” गदध ! गदध ! ” वाली आवाज सुनाई पड़ी थी । मैं तेजी से उधर लपका था । देखा ऑफिस का बड़ा बाबू अपने कमरे से भागते हुए सा निकल रहा था और अंदर मालती झाड़ू को उल्टा पकड़ी सनकी मुद्रा में खड़ी है ‌।
मालती ऑफिस में चाय-पानी पिलाने का काम करती थी । छः माह पूर्व ही पति की जगह उसकी नियुक्ति हुई ‌‌‌‌थी । उसका पति राजू पंडित करोना की भेंट चढ़ गया था । और इसके साथ ही मालती पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था । उसके दोनों बच्चे अभी नाबालिग थे । खुद नौकरी करने के सिवाय मालती के पास कोई विकल्प नहीं था ।
” क्या हुआ मालती ? मुझे लगा अभी अभी इस कमरे में कुछ घटना घटी है !”
मालती रोने लगी । हिचक! हिचक कर !
मैं दो कदम आगे आया । बोला-” तुम डरो नहीं। यहां जो कुछ हुआ सच सच सब कुछ मुझे बता सकती हो । बड़े भाई की तरह मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं -मुंडा को तो मैं वो खबर लूंगा कि छटठी की दूध याद आ जाएगी उसे । ”
नारी तेरे रूप कितने !मेरे मन में भाव आ रहा था ।
” मैं झाड़ू लगा रही थी ..!” हिचकते हुए उसने कहा -” तभी बड़ा बाबू दबे कदमों से अंदर आया इससे पहले कि मैं उसकी तरफ देखती उसने मेरे पीछे दो बार हाथ चला दिया. जबसे काम ज्वानिंग कि हूं तब से कह रहा था ” समझौता कर लो -समझौता कर लो ऐस करोगी ” पर मेरा हर बार यही जवाब होता ” मैं उस तरह की औरत नहीं हूं …!”
कह मालती फिर रोने लगी । मैं उसे रोता छोड़ कमरे से बाहर निकला । पता चला । मुंडा ऑफिस छोड़ भाग चुका है । मैं परियोजना पदाधिकारी से मिलने निकल पड़ा ।
” सेक्सुअल ह्रास मेन्ट ” की दफा लगनी तो तय थी ।

— श्यामल बिहारी महतो