यात्रा वृत्तान्त

मेरी जापान यात्रा – 2

केवल यह जानकार कि आप बाहर से उनके देश में आये हैं वह तीन बार झुक कर अपनी भाषा में स्वागत कहते थे।  स्त्री पुरुष ,बच्चे ,छोकरे छोकरियां आदि सब।  और बोली और उसकी टोन ? वह अनजान अबूझ बोली — इतनी मीठी कि जैसे बुलबुलें चहक रही हों।  यूं तो भारतीय भाषाएं भी बहुत मीठी हैं और संगीतमय मानी जाती हैं परन्तु आवाज़ के उठान- गिरान का कोई अंदाज़ भारतवासियों को नहीं है।  कहीं भी हों बेलिहाज चिल्लाकर दूर से बातें करना उनका स्वभाव है।  विशेषकर उत्तर भारत में।  इंग्लैंड में भी जोर जोर से अपनी आत्मकथा वह सरे राह सुनते कहते हैं।

             ट्यूब  ट्रैन से बाहर निकले।  पथ पूछें घबराएं —-  कौन देश किस ओर जाऊँ मैं ? — थोड़ा नक्शा पढ़ा।  बाहर जाने के एक नहीं तीन दरवाज़े।  एक अधेड़ स्त्री से पूछा।  हम अंग्रेजी में पूछें ,वह अपनी मृदु भाषा में जवाब दे।  फिर समझ गयी कि हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़  रहा।  पर उसने हार नहीं मानी।  इशारतन हुकुम देती हुई सी बोली कि चलो मेरे पीछे। मैं भी उधर ही जा रही हूँ।  मानवता की भाषा कोई भी समझ लेगा।  उसने हमारे तीन अदद सामान में से एक खुद उठा लिया।  मना करने पर नहीं मानी।  हाथ से समझाती कुछ बताती जाती थी।  देखा आगे चढ़ाई है।  जाहिर है दो अदद सामान मेरे पति को उठाना भारी पड़ता।  आस- पास की रहनेवाली होगी शायद।  लम्बी ढलान को पार करते न करते उसको अनेकों ने प्रणाम कहा और हमारी सहायता करने के लिए उसकी सराहना की।  फल -सब्जी का बाज़ार था पर कहीं एक छिलका तक नहीं गिरा हुआ था और बिकनेवाले सामान की व्यवस्था और सज्जा इतनी सुन्दर कि उसके सामने इंग्लैंड गँवारू लगा।  जितना ही व्यवस्थित बाज़ार था उतने ही सीधे लोग।  परिधान में कहीं दिखावा नहीं ,एकदम सुथरे।
             हमें हमारे गली के मुहाने तक पहुंचकर वह अपने घर की ओर मुड़ना चाहती थी फिर भी उसने हमारा तीसरा सुइटकेस उठाकर होटल तक लेजाने की पेशकश की।  हमने मना कर दिया आगे उतराई थी और रास्ता एकदम सीधा।  इशारों से उसने हमें समझा दिया।  हम पहुँच ही गए।  हमारा होटल कहने को तीन सितारा था मगर आधुनिकतम सुविधाएं उपलब्ध थीं और सफाई तो पूछिए मत।  जापानी ढंग के कमरों में पलंग नहीं होते और धान की चटाई बिछी होती है।  यह देश भूकम्पों से परेशान  रहता है अतः लकड़ी का सामान भारी परदे आदि सब अनावश्यक माँने जाते हैं। कम से कम सामान और हलके से हल्का इस्तेमाल किया जाता है।  परदे आदि नहीं थे।   खिड़कियों के फ्रेम में धान का कागज़ लगा था जिससे आरपार नहीं देखा जा सकता था।  लैंपशेड्स भी उसी के बने थे।  फर्श भी धान के बने होते हैं अतः उनपर जूते पहनकर  नहीं चला जा सकता  .इससे वह छिल सकते हैं। बहुत सुन्दर कपडे की स्लिपर्स रखी हुई थीं  फर्श पर ही चटाई के ऊपर एक जोड़ी गद्दे पड़े हुए थे और उनपर बेहद खूबसूरत सफ़ेद चादरों से मढ़ी हुई रजाई।  एक चौंकी पर चाय बनाने का सामान रखा हुआ था।  बाथरूम एकदम आधुनिक ढंग का था। बिस्तर के सिरहाने एक मेज़ पर आदर से महात्मा बुद्ध की जीवनी जापानी और अंग्रेजी भाषा में रखी हुई थी।
               क्यों भारतवर्ष में ऐसी सोंच हमारे होटलों में नहीं है ? होटल  में रहने आनेवाले अपने को अंग्रेज क्यों समझने लगते हैं ? महात्मा बुद्ध ही क्यों ? हमारे देश में तो खजाना है सुन्दर उक्तियों और विचारों का।  हमने क्यों नहीं उनको आदर सम्मान से दैनिक जीवन में उतारा ? सच में मैं तो एकदम पिघल गयी।
              छाती गर्व के उल्लास से भर गयी।  सर फूलकर कुप्पा हो गया।  इसके बाद जापान में जापान को कम और भारत को अधिक महसूस किया।  
क्रमशः