कविता

सबकुछ ड्रामा है

देश के हर क्षेत्र के
महापुरुषों के
सुचिंत्य विचारों की
कद्र होनी चाहिए,
किन्तु हम जैसों के
वाज़िब विचारों को
खारिज़ कर नहीं!
सुपरस्टार
रजनीकांत के शब्दों में-
“मैंने आजीविका के लिए
अभिनय किया,
उसके बाद
मैंने अपने जीवन की
जरूरतें पूरी कर ली।
अब मैं इसका
आनंद ले रहा हूँ।
अब यह मेरे लिए
मनोरंजक कार्य है।
यह किसी
पेशे की तरह नहीं रहा।
अगर मैं इसे
पेशे की तरह लेने लगूं,
तो फिर काम
एक बोझ बन जायेगा।
अब यह खेल की तरह है,
जिससे मुझे
सुकून मिल रहा है।
शायद यही सोच
मुझे ऊर्जा देती है।
इतना ही नहीं,
अपने कैरियर में
जीवन का
सबसे बड़ा सबक
यही है
कि ‘सबकुछ ड्रामा है’।”
आँखों ने ठगकर हमें,
अंधा बना डाला!
कानों ने ठगकर हमें,
बहरा बना डाला!
मुखों ने ठगकर हमें,
गूंगा बना डाला!
औ’ सिसकने लगा
मैं अकेला!