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सुपरस्टार रजनीकांत, राहुल गाँधी और चुनाव

12 दिसंबर 1950 को जन्मे श्री शिवाजीराव गायकवाड़ यानी उत्तर-दक्षिण सिनेमा की दूरी को पाटनेवाले महान अभिनेता “रजनीकांत” ने तमिल फिल्म ‘अपूर्व रागांगल’ से अभिनय की दुनिया में आये। श्रीमान अमिताभ बच्चन को आदर्श माननेवाले श्री रजनीकांत ने बच्चन जी के साथ ही पहली हिंदी फिल्म ‘अंधा कानून’ में जबरदस्त अभिनय किया। पद्मविभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार विजेता श्री रजनीकांत सर के अनुसार-
“मैंने आजीविका के लिए अभिनय किया, उसके बाद मैंने अपने जीवन की जरूरतें पूरी कर ली । अब मैं इसका आनंद ले रहा हूँ । अब यह मेरे लिए मनोरंजक कार्य है । यह किसी पेशे की तरह नहीं रहा । अगर मैं इसे पेशे की तरह लेने लगूं, तो फिर काम एक बोझ बन जायेगा । अब यह खेल की तरह है, जिससे मुझे सुकून मिल रहा है । शायद यही सोच मुझे ऊर्जा देती है।  इतना ही नहीं, अपने कैरियर में जीवन का सबसे बड़ा सबक यही है कि ‘सबकुछ ड्रामा है’।”
जन्मदिवस पर साउथ सिनेमा के भगवान कहे जानवाले रजनीकांत जी को स्वस्थजीवन और आनंदपूर्ण जीवन के लिए शुभ-शुभ-शुभ-शुभ मंगलकामनाएँ।
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मोतीलाल नेहरू से 6ठा खानदानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल माइनो नेहरू गाँधी। बधाई, राहुल जी ! परंतु बचकानी हिंदी से बचते हुए उचकानी हिंदी में आइये । आपने लालू जी को फिर MP बनने नहीं दिए और विधेयक को फाड़ डाले । वहीं अय्यर के मणि (विष) को शंकर तक ले चले गए… ये दम तो दिखाया आपने, किन्तु 2019 क्या 2024 तक तो चट्टान है आपके आगे, आप पत्थर हैं, चट्टान के सामने टिक नहीं पाएंगे ! अपने पार्टी को भ्रष्टाचारमुक्त तो कीजिये, राहुल जी ! हाँ, कथित ब्राह्मण बन जनेऊ धारण कर विदेश प्रवास चले जाने पर भारत का क्या भला होगा, इसलिए व्यथित शूद्र बनिये, राहुल जी । …. हाँ, शेष को लेकर आपके भविष्य के लिए शुभमंगलकामनाएँ ! संभालिये खानदानी पद को, क्योंकि लोकतंत्र गायब होते जा रहा, आपके यहाँ ! क्योंकि 6ठा कांग्रेस अध्यक्ष भए आप अपने खानदान से…… जय हो, राहुल बाबा !
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मतदाताओं का हंटर यानी विधानसभा मतदान-परिणाम कर गए ‘लोकसभा’ के दिलचस्प-आगाज़। पाँचों विधानसभा-चुनाव के मतदान-परिणाम प्रत्याशित ही थे। वैसे सत्ता पक्ष की ओर हवा कम ही बनती है, तथापि तेलंगाना और मिजोरम में स्थानीय पार्टियों का आना, खासकर तेलंगाना में राज्य के संस्थापक सेनानी और प्रथम -सह- कार्यवाहक मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव को पहला कार्यकाल के लिए मनोनुकूल कार्यावधि प्राप्त नहीं हो सकी थी, उन्हें यह चांस पुनः मिलना जरूरी था, मिज़ोरम में मिज़ो-संस्कृति निकटरूपेण हावी है । वहीं,  शेष तीनों राज्यों में, यथा- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में विपक्षी कांग्रेस ने छलांग लगाई है, राजस्थान का रिज़ल्ट ‘छत्तीसगढ़’ जैसा होना सोच में आ सकता था, किन्तु छत्तीसगढ़ से डॉक्टर साहब आउट हो जाएंगे, किसी ने सोचा नहीं था ! मध्यप्रदेश में कशमकश की खुशी ‘मामा’ ने दिया । परंतु यह स्थितियाँ भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा-चुनाव पर फतह हेतु सही नहीं है । जोकि अतिशय मुश्किल होता दिख रहा है, तथापि यह कयास भर है, क्योंकि राजनीति में फ़िजा चंद क्षणों में बदल जाते हैं । भले ही राजस्थान और मध्यप्रदेश में त्रिशंकु की स्थिति हो गयी है, किन्तु यह स्थिति आगामी लोकसभा चुनाव में बिल्कुल साफ हो जाएगी, क्योंकि हमें यह नहीं भूलने चाहिए कि विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दे पर लड़े जाते हैं, तो लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दे को लेकर। यानी लोकसभा चुनाव बनाम देश की अखंडता ही सबसे प्रभावी स्लोगन हो सकता है!